Couplets Poetry (page 386)

रात पी ज़मज़म पे मय और सुब्ह-दम

ग़ालिब

रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ

ग़ालिब

क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'

ग़ालिब

क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन

ग़ालिब

क़त्अ कीजे न तअ'ल्लुक़ हम से

ग़ालिब

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ

ग़ालिब

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

ग़ालिब

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

ग़ालिब

पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ राग से जैसे बाजा

ग़ालिब

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है

ग़ालिब

पूछे है क्या वजूद ओ अदम अहल-ए-शौक़ का

ग़ालिब

पिन्हाँ था दाम-ए-सख़्त क़रीब आशियान के

ग़ालिब

पिला दे ओक से साक़ी जो हम से नफ़रत है

ग़ालिब

पी जिस क़दर मिले शब-ए-महताब में शराब

ग़ालिब

फूँका है किस ने गोश-ए-मोहब्बत में ऐ ख़ुदा

ग़ालिब

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

ग़ालिब

फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया

ग़ालिब

फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार

ग़ालिब

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम

ग़ालिब

पकड़े जाते हैं फ़रिश्तों के लिखे पर ना-हक़

ग़ालिब

निस्यह-ओ-नक़्द-ए-दो-आलम की हक़ीक़त मालूम

ग़ालिब

नींद उस की है दिमाग़ उस का है रातें उस की हैं

ग़ालिब

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन

ग़ालिब

ने तीर कमाँ में है न सय्याद कमीं में

ग़ालिब

नज़्ज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का

ग़ालिब

नज़र लगे न कहीं उन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

नज़र लगे न कहीं इन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

नशा-ए-रंग से है वाशुद-ए-गुल

ग़ालिब

ना-कर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद

ग़ालिब

नाकामी-ए-निगाह है बर्क़-ए-नज़ारा-सोज़

ग़ालिब