Couplets Poetry (page 384)
या-रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए
ग़ालिब
या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
ग़ालिब
यही है आज़माना तो सताना किस को कहते हैं
ग़ालिब
या रब हमें तो ख़्वाब में भी मत दिखाइयो
ग़ालिब
वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
ग़ालिब
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
ग़ालिब
विदाअ ओ वस्ल में हैं लज़्ज़तें जुदागाना
ग़ालिब
वाइज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको
ग़ालिब
वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ
ग़ालिब
वफ़ा-दारी ब-शर्त-ए-उस्तुवारी अस्ल ईमाँ है
ग़ालिब
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
ग़ालिब
वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
ग़ालिब
उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
ग़ालिब
उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है 'ग़ालिब'
ग़ालिब
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
ग़ालिब
उम्र भर का तू ने पैमान-ए-वफ़ा बाँधा तो क्या
ग़ालिब
उधर वो बद-गुमानी है इधर ये ना-तवानी है
ग़ालिब
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
ग़ालिब
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो
ग़ालिब
तुझ से तो कुछ कलाम नहीं लेकिन ऐ नदीम
ग़ालिब
तुझ से क़िस्मत में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
ग़ालिब
तू ने क़सम मय-कशी की खाई है 'ग़ालिब'
ग़ालिब
तू और आराइश-ए-ख़म-ए-काकुल
ग़ालिब
थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
ग़ालिब
था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ
ग़ालिब
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद'
ग़ालिब
तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
ग़ालिब
तिरे जवाहिर-ए-तरफ़-ए-कुलह को क्या देखें
ग़ालिब
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है
ग़ालिब
तमाशा कि ऐ महव-ए-आईना-दारी
ग़ालिब