Couplets Poetry (page 382)

आज खुला दुश्मन के पीछे दुश्मन थे

ग़ुलाम हुसैन साजिद

नाज़ ने फिर किया आग़ाज़ वो अंदाज़-ए-नियाज़

ग़ुलाम भीक नैरंग

मेरे पहलू में तुम आओ ये कहाँ मेरे नसीब

ग़ुलाम भीक नैरंग

महव-ए-दीद-ए-चमन-ए-शौक़ है फिर दीदा-ए-शौक़

ग़ुलाम भीक नैरंग

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती

ग़ुलाम भीक नैरंग

दर्द उल्फ़त का न हो तो ज़िंदगी का क्या मज़ा

ग़ुलाम भीक नैरंग

दाना-ओ-दाम सँभाला मिरे सय्याद ने फिर

ग़ुलाम भीक नैरंग

आह! कल तक वो नवाज़िश! आज इतनी बे-रुख़ी

ग़ुलाम भीक नैरंग

कुछ तुझ को ख़बर है कि नहीं हो के दो टुकड़े

ग़ुलाम अहमद फ़रीद

नवाह-ए-लफ़्ज़-ओ-मआनी में गूँज है किस की

ग़ुफ़रान अमजद

कोई जुगनू कोई तारा कोई सूरज कोई चाँद

ग़ुफ़रान अमजद

कब से बंजर थी नज़र ख़्वाब तो आया

ग़ुफ़रान अमजद

कोई सबब तो था कि 'ग़ौस' फ़हम-ओ-ज़का के बावजूद

गाैस मथरावी

अजब तरह का अधूरापन है मिरे बयाँ में

ग़ज़नफ़र हाशमी

ज़ेहन के ख़ानों में जाने वक़्त ने क्या भर दिया

ग़ज़नफ़र

तुम्हारे होते हुए लोग क्यूँ भटकते हैं

ग़ज़नफ़र

रफ़्ता रफ़्ता आँखों को हैरानी दे कर जाएगा

ग़ज़नफ़र

न जाने किस तरह बिस्तर में घुस कर बैठ जाती हैं

ग़ज़नफ़र

मैं उस के झूट को भी सच समझ के सुनता हूँ

ग़ज़नफ़र

मैं ऐसा नर्म तबीअत कभी न था पहले

ग़ज़नफ़र

कल तक जो शफ़्फ़ाफ़ थे चेहरे आवाज़ों से ख़ाली थे

ग़ज़नफ़र

हम कि साहिल के तसव्वुर से सहम जाते हैं

ग़ज़नफ़र

हर एक रात कहीं दूर भाग जाता हूँ

ग़ज़नफ़र

हमारे हाथ से वो भी निकल गया आख़िर

ग़ज़नफ़र

दफ़्तर में ज़ेहन घर निगह रास्ते में पाँव

ग़ज़नफ़र

बच के दुनिया से घर चले आए

ग़ज़नफ़र

अजीब बात हमारा ही ख़ूँ हुआ पानी

ग़ज़नफ़र

वो लुत्फ़ उठाएगा सफ़र का

ग़मगीन देहलवी

शम्अ-रू आशिक़ को अपने यूँ जलाना चाहिए

ग़मगीन देहलवी

मुझे जो दोस्ती है उस को दुश्मनी मुझ से

ग़मगीन देहलवी