Couplets Poetry (page 380)

मैं राज़दाँ हूँ ये कि जहाँ था वहाँ न था

ग़ुलाम मौला क़लक़

क्यूँकर न आस्तीं में छुपा कर पढ़ें नमाज़

ग़ुलाम मौला क़लक़

क्या ख़ाना-ख़राबों का लगे तेरे ठिकाना

ग़ुलाम मौला क़लक़

कुफ़्र और इस्लाम में देखा तो नाज़ुक फ़र्क़ था

ग़ुलाम मौला क़लक़

किस लिए दावा-ए-ज़ुलेख़ाई

ग़ुलाम मौला क़लक़

किधर क़फ़स था कहाँ हम थे किस तरफ़ ये क़ैद

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न करते हम

ग़ुलाम मौला क़लक़

ख़ुद को कभी न देखा आईने ही को देखा

ग़ुलाम मौला क़लक़

कौन जाने था उस का नाम-ओ-नुमूद

ग़ुलाम मौला क़लक़

जो कहता है वो करता है बर-अक्स उस के काम

ग़ुलाम मौला क़लक़

जी है ये बिन लगे नहीं रहता

ग़ुलाम मौला क़लक़

झगड़ा था जो दिल पे उस को छोड़ा

ग़ुलाम मौला क़लक़

जबीन-ए-पारसा को देख कर ईमाँ लरज़ता है

ग़ुलाम मौला क़लक़

हम उस कूचे में उठने के लिए बैठे हैं मुद्दत से

ग़ुलाम मौला क़लक़

हो मोहब्बत की ख़बर कुछ तो ख़बर फिर क्यूँ हो

ग़ुलाम मौला क़लक़

हर संग में काबे के निहाँ इश्वा-ए-बुत है

ग़ुलाम मौला क़लक़

है अगर कुछ वफ़ा तो क्या कहने

ग़ुलाम मौला क़लक़

गली से अपनी इरादा न कर उठाने का

ग़ुलाम मौला क़लक़

फ़िक्र-ए-सितम में आप भी पाबंद हो गए

ग़ुलाम मौला क़लक़

दिल के हर जुज़्व में जुदाई है

ग़ुलाम मौला क़लक़

दयार-ए-यार का शायद सुराग़ लग जाता

ग़ुलाम मौला क़लक़

बुत-ख़ाने की उल्फ़त है न काबे की मोहब्बत

ग़ुलाम मौला क़लक़

बोसा देने की चीज़ है आख़िर

ग़ुलाम मौला क़लक़

अश्क के गिरते ही आँखों में अंधेरा छा गया

ग़ुलाम मौला क़लक़

अंदाज़ा आदमी का कहाँ गर न हो शराब

ग़ुलाम मौला क़लक़

अम्न और तेरे अहद में ज़ालिम

ग़ुलाम मौला क़लक़

आसमाँ अहल-ए-ज़मीं से क्या कुदूरत-नाक था

ग़ुलाम मौला क़लक़

ये सच है मिल बैठने की हद तक तो काम आई है ख़ुश-गुमानी

ग़ुलाम हुसैन साजिद

ये सच है मेरी सदा ने रौशन किए हैं मेहराब पर सितारे

ग़ुलाम हुसैन साजिद

ये आब-ओ-ताब इसी मरहले पे ख़त्म नहीं

ग़ुलाम हुसैन साजिद