Couplets Poetry (page 378)
याद अश्कों में बहा दी हम ने
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
वो लोग मुतमइन हैं कि पत्थर हैं उन के पास
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
वफ़ा के शहर में अब लोग झूट बोलते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
उम्मीद की सूखती शाख़ों से सारे पत्ते झड़ जाएँगे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तुम यूँ ही नाराज़ हुए हो वर्ना मय-ख़ाने का पता
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सोचा है तुम्हारी आँखों से अब मैं उन को मिलवा ही दूँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सायों की ज़द में आ गईं सारी ग़ुलाम-गर्दिशें
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सब से अच्छा कह के उस ने मुझ को रुख़्सत कर दिया
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
प्यार गया तो कैसे मिलते रंग से रंग और ख़्वाब से ख़्वाब
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
मोहब्बत की गवाही अपने होने की ख़बर ले जा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कोई मुँह फेर लेता है तो 'क़ासिर' अब शिकायत क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़ुशबू गिरफ़्त-ए-अक्स में लाया और उस के बाद
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहते हैं इन शाख़ों पर फल फूल भी आते थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिस को इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिन की दर्द-भरी बातों से एक ज़माना राम हुआ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
इस तरह क़हत-ए-हवा की ज़द में है मेरा वजूद
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम ने तुम्हारे ग़म को हक़ीक़त बना दिया
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम तो वहाँ पहुँच नहीं सकते तमाम उम्र
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हज़ारों इस में रहने के लिए आए
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर साल बहार से पहले मैं पानी पर फूल बनाता हूँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर बच्चा आँखें खोलते ही करता है सवाल मोहब्बत का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर