Couplets Poetry (page 377)
किसी ने भेज कर काग़ज़ की कश्ती
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
किसी की राह में आने की ये भी सूरत है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कैसा इंसाँ तरस रहा है जीने को
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कहाँ तक उस की मसीहाई का शुमार करूँ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
जो उस तरफ़ से इशारा कभी किया उस ने
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
झाँकता भी नहीं सूरज मिरे घर के अंदर
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
जैसे कोई काट रहा है जाल मिरा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हुस्न-ए-अमल में बरकतें होती हैं बे-शुमार
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हिसार-ए-जिस्म मिरा तोड़-फोड़ डालेगा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हर एक साँस मुझे खींचती है उस की तरफ़
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हम-सरी उन की जो करना चाहे
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
गर्मियों भर मिरे कमरे में पड़ा रहता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
एक इक लफ़्ज़ से मअनी की किरन फूटती है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
एक दिन दरिया मकानों में घुसा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
दूसरा कोई तमाशा न था ज़ालिम के पास
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
दिल ने तमन्ना की थी जिस की बरसों तक
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
देखने सुनने का मज़ा जब है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
चले थे जिस की तरफ़ वो निशान ख़त्म हुआ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
चाहता है वो कि दरिया सूख जाए
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अपनी तस्वीर के इक रुख़ को निहाँ रखता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अपनी क़िस्मत का बुलंदी पे सितारा देखूँ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ऐ मिरे पायाब दरिया तुझ को ले कर क्या करूँ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अब मिरे गिर्द ठहरती नहीं दीवार कोई
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अब जो आज़ाद हुए हैं तो ख़याल आया है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अब और देर न कर हश्र बरपा करने में
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
आता था जिस को देख के तस्वीर का ख़याल
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
तेरे रुख़्सारों से दुनिया रौशन थी
ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़
पैदल हमें जो देख के कतराते थे कभी
ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़
ज़मानों को उड़ानें बर्क़ को रफ़्तार देता था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर