Couplets Poetry (page 376)
फिर एक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब भड़केगा
गोपाल मित्तल
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
गोपाल मित्तल
मेरा साक़ी है बड़ा दरिया-दिल
गोपाल मित्तल
क्या कीजिए कशिश है कुछ ऐसी गुनाह में
गोपाल मित्तल
ख़ुदा गवाह कि दोनों हैं दुश्मन-ए-परवाज़
गोपाल मित्तल
फ़ितरत में आदमी की है मुबहम सा एक ख़ौफ़
गोपाल मित्तल
फ़र्क़ ये है नुत्क़ के साँचे में ढल सकता नहीं
गोपाल मित्तल
अब शिकवा-ए-संग-ओ-ख़िश्त कैसा
गोपाल मित्तल
मुझे उस नींद के माथे का बोसा हो इनायत
ग़ज़ाला शाहिद
ज़बान अपनी बदलने पे कोई राज़ी नहीं
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
यूँही बुनियाद का दर्जा नहीं मिलता किसी को
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ये लोग किस की तरफ़ देखते हैं हसरत से
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ये दौर है जो तुम्हारा रहेगा ये भी नहीं
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
यारों ने मेरी राह में दीवार खींच कर
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
उस ने जब दरवाज़ा मुझ पर बंद किया
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
साँसों के आने जाने से लगता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
सहरा जंगल सागर पर्बत
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
रखता नहीं है दश्त सरोकार आब से
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
रख दिया वक़्त ने आईना बना कर मुझ को
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
रहेगा आईने की तरह आब पर क़ाएम
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
पुरखों से चली आती है ये नक़्ल-ए-मकानी
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
पहले उस ने मुझे चुनवा दिया दीवार के साथ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
पहले चिंगारी उड़ा लाई हवा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
न जाने क़ैद में हूँ या हिफ़ाज़त में किसी की
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मेरी पहचान बताने का सवाल आया जब
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मेरी कश्ती को डुबो कर चैन से बैठे न तू
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मैं तिरे वास्ते आईना था
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कुछ ऐसे देखता है वो मुझे कि लगता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कितना भी रंग-ओ-नस्ल में रखते हों इख़्तिलाफ़
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही