Couplets Poetry (page 374)

एक परछाईं तसव्वुर की मिरे साथ रहे

गुलनार आफ़रीन

एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया

गुलनार आफ़रीन

दिल का हर ज़ख़्म तिरी याद का इक फूल बने

गुलनार आफ़रीन

बग़ैर सम्त के चलना भी काम आ ही गया

गुलनार आफ़रीन

यार गर पूछे तो कीजे कुछ अर्ज़

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

तुझ बिन इक दल हो पास रहता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

शब-ए-हिज्र में एक दिन देखना

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

नाचार है दिल ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर के आगे

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

करूँ क़त्-ए-उल्फ़त बुतों से व-लेकिन

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

कहूँ कि शैख़-ए-ज़माना हूँ लाफ़ तो ये है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

कभी हाथ भी आएगा यार सच कह

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

कब इस जी की हालत कोई जानता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

जो जी चाहे है देखूँ माह-ए-नौ कहता है दिल मेरा

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

इश्क़ ने सामने होते ही जलाया दिल को

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

इश्क़ में ख़ूब नीं बहुत रोना

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

इश्क़ में दर्द से है हुर्मत-ए-दिल

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

हर कोई अपनी फ़हम-ए-नाक़िस में

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

हाजी तू तो राह को भूला मंज़िल को कोई पहुँचे है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

हैं शैख़ ओ बरहमन तस्बीह और ज़ुन्नार के बंदे

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

है अफ़्सोस ऐ उम्र जाने का तेरे

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

ग़ैर वफ़ा में पुख़्ता हैं यूँ ही सही प मुझ सा भी

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

गर शैख़ अज़्म-ए-मंज़िल-ए-हक़ है तो आ इधर

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

दीन ओ दुनिया का जो नहीं पाबंद

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

देखना ज़ोर ही गाँठा है दिल-ए-यार से दिल

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

बहार इस धूम से आई गई उम्मीद जीने की

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

और रब्त जिसे कुफ़्र से है या'नी बरहमन

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

ऐ बहर न तू इतना उमँड चल मिरे आगे

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

अदा को तिरी मेरा जी जानता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

अबस घर से अपने निकाले है तू

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

आज़ुर्दा कुछ हैं शायद वर्ना हुज़ूर मुझ से

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी