Couplets Poetry (page 372)
जाने वालों की कमी पूरी कभी होती नहीं
गुलज़ार बुख़ारी
चलूँ तो मस्लहत ये कह के पाँव थाम लेती है
गुलज़ार बुख़ारी
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
गुलज़ार
ज़िंदगी पर भी कोई ज़ोर नहीं
गुलज़ार
ज़ख़्म कहते हैं दिल का गहना है
गुलज़ार
यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता
गुलज़ार
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
गुलज़ार
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं
गुलज़ार
ये दिल भी दोस्त ज़मीं की तरह
गुलज़ार
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
गुलज़ार
वो उम्र कम कर रहा था मेरी
गुलज़ार
वो एक दिन एक अजनबी को
गुलज़ार
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
गुलज़ार
उसी का ईमाँ बदल गया है
गुलज़ार
तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
गुलज़ार
शाम से आँख में नमी सी है
गुलज़ार
सहमा सहमा डरा सा रहता है
गुलज़ार
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
गुलज़ार
राख को भी कुरेद कर देखो
गुलज़ार
रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे
गुलज़ार
फिर वहीं लौट के जाना होगा
गुलज़ार
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को
गुलज़ार
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
गुलज़ार
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
गुलज़ार
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
गुलज़ार
ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
गुलज़ार
काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं
गुलज़ार
कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
गुलज़ार
कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
गुलज़ार
जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
गुलज़ार