Couplets Poetry (page 373)
जब भी ये दिल उदास होता है
गुलज़ार
हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में
गुलज़ार
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
गुलज़ार
गो बरसती नहीं सदा आँखें
गुलज़ार
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे
गुलज़ार
एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है
गुलज़ार
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
गुलज़ार
दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है
गुलज़ार
देर से गूँजते हैं सन्नाटे
गुलज़ार
चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
गुलज़ार
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं
गुलज़ार
भरे हैं रात के रेज़े कुछ ऐसे आँखों में
गुलज़ार
अपने साए से चौंक जाते हैं
गुलज़ार
अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
गुलज़ार
आप ने औरों से कहा सब कुछ
गुलज़ार
आप के बा'द हर घड़ी हम ने
गुलज़ार
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
गुलज़ार
आँखों के पोछने से लगा आग का पता
गुलज़ार
आइना देख कर तसल्ली हुई
गुलज़ार
आग में क्या क्या जला है शब भर
गुलज़ार
आदतन तुम ने कर दिए वादे
गुलज़ार
ये तिलिस्म-ए-मौसम-ए-गुल नहीं कि ये मोजज़ा है बहार का
गुलनार आफ़रीन
वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा
गुलनार आफ़रीन
सफ़र का रंग हसीं क़ुर्बतों का हामिल हो
गुलनार आफ़रीन
क्या बात है क्यूँ शहर में अब जी नहीं लगता
गुलनार आफ़रीन
किन शहीदों के लहू के ये फ़रोज़ाँ हैं चराग़
गुलनार आफ़रीन
कहिए आईना-ए-सद-फ़स्ल-ए-बहाराँ तुझ को
गुलनार आफ़रीन
हम सर-ए-राह-ए-वफ़ा उस को सदा क्या देते
गुलनार आफ़रीन
हमें भी अब दर ओ दीवार घर के याद आए
गुलनार आफ़रीन
'गुलनार' मस्लहत की ज़बाँ में न बात कर
गुलनार आफ़रीन