Couplets Poetry (page 375)

आँखों से इसी तरह अगर सैल रवाँ है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

ज़िंदगी इश्क़-ओ-मोहब्बत से जवाँ होती है

ग़ुलाम नबी हकीम

तिरी हस्ती से क़ाएम है ये हस्ती

ग़ुलाम नबी हकीम

आईना-ख़ाने से दामन को बचा कर गुज़रो

गुलाम जीलानी असग़र

ज़ोफ़ से रहता है अब पाँव पे सर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

ज़ाहिदो क़ुदरत-ए-ख़ुदा देखो

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

वो तिफ़्ल-ए-नुसैरी आए शायद

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

ठुकरा के चले जबीं को मेरी

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

सारे क़ुरआन से उस परी-रू को

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

सख़्त है हैरत हमें जो ज़ेर-ए-अबरू ख़ाल है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नासेहा आशिक़ी में रख मा'ज़ूर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नक़्श-ए-पा पंच-शाख़ा क़बर पर रौशन करो

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

नहीं बचता है बीमार-ए-मोहब्बत

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

न मर के भी तिरी सूरत को देखने दूँगा

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

न होगा कोई मुझ सा महव-ए-तसव्वुर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

मिस्ल-ए-तिफ़्लाँ वहशियों से ज़िद है चर्ख़-ए-पीर को

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

ख़ून मिरा कर के लगाना न हिना मेरे ब'अद

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

जामा-ए-सुर्ख़ तिरा देख के गुल

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

इत्र मिट्टी का लगाया चाहिए पोशाक में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

हर गाम पे ही साए से इक मिस्रा-ए-मौज़ूँ

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

गया है कूचा-ए-काकुल में अब दिल

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

गर हमारे क़त्ल के मज़मूँ का वो नामा लिखे

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दिमाग़ और ही पाती हैं इन हसीनों में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दर पे नालाँ जो हूँ तो कहता है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

बिजली चमकी तो अब्र रोया

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

अपने सिवा नहीं है कोई अपना आश्ना

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

ऐ जुनूँ हाथ जो वो ज़ुल्फ़ न आई होती

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

आसमाँ कहते हैं जिस को वो ज़मीन-ए-शेर है

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई

गोपालदास नीरज

तर्क-ए-तअल्लुक़ात ख़ुद अपना क़ुसूर था

गोपाल मित्तल