Couplets Poetry (page 379)

गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

दिन अंधेरों की तलब में गुज़रा

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बयाबाँ दूर तक मैं ने सजाया था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

अब उसी आग में जलते हैं जिसे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

आया है इक राह-नुमा के इस्तिक़बाल को इक बच्चा

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

ज़ुलेख़ा बे-ख़िरद आवारा लैला बद-मज़ा शीरीं

ग़ुलाम मौला क़लक़

ज़हे क़िस्मत कि उस के क़ैदियों में आ गए हम भी

ग़ुलाम मौला क़लक़

वो ज़िक्र था तुम्हारा जो इंतिहा से गुज़रा

ग़ुलाम मौला क़लक़

वो संग-दिल अंगुश्त-ब-दंदाँ नज़र आवे

ग़ुलाम मौला क़लक़

वाइ'ज़ ये मय-कदा है न मस्जिद कि इस जगह

ग़ुलाम मौला क़लक़

वाइ'ज़ ने मय-कदे को जो देखा तो जल गया

ग़ुलाम मौला क़लक़

उस से न मिलिए जिस से मिले दिल तमाम उम्र

ग़ुलाम मौला क़लक़

तुझ से ऐ ज़िंदगी घबरा ही चले थे हम तो

ग़ुलाम मौला क़लक़

तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर सही

ग़ुलाम मौला क़लक़

तू देख तो उधर कि जो देखा न जाए फिर

ग़ुलाम मौला क़लक़

तिरी नवेद में हर दास्ताँ को सुनते हैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

तेरा दीवाना तो वहशत की भी हद से निकला

ग़ुलाम मौला क़लक़

शहर उन के वास्ते है जो रहते हैं तुझ से दूर

ग़ुलाम मौला क़लक़

रहम कर मस्तों पे कब तक ताक़ पर रक्खेगा तू

ग़ुलाम मौला क़लक़

पहले रख ले तू अपने दिल पर हाथ

ग़ुलाम मौला क़लक़

पड़ा है दैर-ओ-काबा में ये कैसा ग़ुल ख़ुदा जाने

ग़ुलाम मौला क़लक़

नाला करता हूँ लोग सुनते हैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

न ये है न वो है न मैं हूँ न तू है

ग़ुलाम मौला क़लक़

न लगती आँख तो सोने में क्या बुराई थी

ग़ुलाम मौला क़लक़

न हो आरज़ू कुछ यही आरज़ू है

ग़ुलाम मौला क़लक़

मूसा के सर पे पाँव है अहल-ए-निगाह का

ग़ुलाम मौला क़लक़

मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता

ग़ुलाम मौला क़लक़