Couplets Poetry (page 383)
मेरी ये आरज़ू है वक़्त-ए-मर्ग
ग़मगीन देहलवी
कोई समझाओ उन्हें बहर-ए-ख़ुदा ऐ मोमिनो
ग़मगीन देहलवी
किया बदनाम इक आलम ने 'ग़मगीं' पाक-बाज़ी में
ग़मगीन देहलवी
जाम ले कर मुझ से वो कहता है अपने मुँह को फेर
ग़मगीन देहलवी
हाथ से मेरे वो पीता नहीं मुद्दत से शराब
ग़मगीन देहलवी
'ग़मगीं' जो एक आन पे तेरे अदा हुआ
ग़मगीन देहलवी
रंगों की बारिशों से धुँदला गया है मंज़र
ग़ालिब इरफ़ान
ज़िंदगानी में सभी रंग थे महरूमी के
ग़ालिब अयाज़
तुम्हारे दर से उठाए गए मलाल नहीं
ग़ालिब अयाज़
तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन
ग़ालिब अयाज़
फिर यही रुत हो ऐन मुमकिन है
ग़ालिब अयाज़
हम उस के जब्र का क़िस्सा तमाम चाहते हैं
ग़ालिब अयाज़
हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए
ग़ालिब अयाज़
भले ही छाँव न दे आसरा तो देता है
ग़ालिब अयाज़
ज़ोफ़ से गिर्या मुबद्दल ब-दम-ए-सर्द हुआ
ग़ालिब
ज़ोफ़ में तअना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है
ग़ालिब
ज़िंदगी में तो वो महफ़िल से उठा देते थे
ग़ालिब
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
ग़ालिब
ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं
ग़ालिब
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
ग़ालिब
ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वर्ना
ग़ालिब
ज़बाँ पे बार-ए-ख़ुदाया ये किस का नाम आया
ग़ालिब
यूसुफ़ उस को कहो और कुछ न कहे ख़ैर हुई
ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
ग़ालिब
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ये लाश-ए-बे-कफ़न 'असद'-ए-ख़स्ता-जाँ की है
ग़ालिब
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
ग़ालिब
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
ग़ालिब
ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
ग़ालिब