Couplets Poetry (page 385)
ताब लाए ही बनेगी 'ग़ालिब'
ग़ालिब
ताअत में ता रहे न मय-ओ-अँगबीं की लाग
ग़ालिब
ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर
ग़ालिब
सुनते हैं जो बहिश्त की तारीफ़ सब दुरुस्त
ग़ालिब
सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
ग़ालिब
सीखे हैं मह-रुख़ों के लिए हम मुसव्वरी
ग़ालिब
शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश
ग़ालिब
शेर 'ग़ालिब' का नहीं वही ये तस्लीम मगर
ग़ालिब
शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम
ग़ालिब
सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
ग़ालिब
सताइश-गर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़-ए-रिज़वाँ का
ग़ालिब
सर पा-ए-ख़ुम पे चाहिए हंगाम-ए-बे-ख़ुदी
ग़ालिब
सँभलने दे मुझे ऐ ना-उमीदी क्या क़यामत है
ग़ालिब
समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
ग़ालिब
साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर
ग़ालिब
सादिक़ हूँ अपने क़ौल का 'ग़ालिब' ख़ुदा गवाह
ग़ालिब
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं
ग़ालिब
साबित हुआ है गर्दन-ए-मीना पे ख़ून-ए-ख़ल्क़
ग़ालिब
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ग़ालिब
रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए
ग़ालिब
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
ग़ालिब
रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे
ग़ालिब
रश्क कहता है कि उस का ग़ैर से इख़्लास हैफ़
ग़ालिब
रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
ग़ालिब
रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआफ़
ग़ालिब
रहमत अगर क़ुबूल करे क्या बईद है
ग़ालिब
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
ग़ालिब
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
ग़ालिब
रहे न जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजे
ग़ालिब
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
ग़ालिब