Couplets Poetry (page 388)
मय से ग़रज़ नशात है किस रू-सियाह को
ग़ालिब
लिखते रहे जुनूँ की हिकायात-ए-ख़ूँ-चकाँ
ग़ालिब
लेता नहीं मिरे दिल-ए-आवारा की ख़बर
ग़ालिब
लेता हूँ मकतब-ए-ग़म-ए-दिल में सबक़ हुनूज़
ग़ालिब
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
ग़ालिब
लरज़ता है मिरा दिल ज़हमत-ए-मेहर-ए-दरख़्शाँ पर
ग़ालिब
क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़
ग़ालिब
क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बे-दाद कि हम
ग़ालिब
क्यूँ न फ़िरदौस में दोज़ख़ को मिला लें यारब
ग़ालिब
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
ग़ालिब
क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल
ग़ालिब
क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
ग़ालिब
क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया
ग़ालिब
क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब
ग़ालिब
कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
ग़ालिब
कोई वीरानी सी वीरानी है
ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती
ग़ालिब
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ग़ालिब
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
ग़ालिब
किसी को दे के दिल कोई नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ क्यूँ हो
ग़ालिब
की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं
ग़ालिब
की उस ने गर्म सीना-ए-अहल-ए-हवस में जा
ग़ालिब
की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
ग़ालिब
खुलता किसी पे क्यूँ मिरे दिल का मोआमला
ग़ालिब
खुलेगा किस तरह मज़मूँ मिरे मक्तूब का या रब
ग़ालिब
ख़ुदाया जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है
ग़ालिब
ख़ुदा शरमाए हाथों को कि रखते हैं कशाकश में
ग़ालिब
ख़ूब था पहले से होते जो हम अपने बद-ख़्वाह
ग़ालिब
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
ग़ालिब
काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई न पूछ
ग़ालिब