Couplets Poetry (page 390)
जान दी दी हुई उसी की थी
ग़ालिब
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
ग़ालिब
इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
ग़ालिब
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
ग़ालिब
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
ग़ालिब
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
ग़ालिब
इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या
ग़ालिब
इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं
ग़ालिब
ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
ग़ालिब
इब्न-ए-मरयम हुआ करे कोई
ग़ालिब
हूँ गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
ग़ालिब
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
ग़ालिब
हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ग़ालिब
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
ग़ालिब
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
ग़ालिब
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
ग़ालिब
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
ग़ालिब
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
ग़ालिब
हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे
ग़ालिब
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
ग़ालिब
हुई जिन से तवक़्क़ो ख़स्तगी की दाद पाने की
ग़ालिब
हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
ग़ालिब
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
ग़ालिब
होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
ग़ालिब
हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएँ सब तमाम
ग़ालिब
हज़रत-ए-नासेह गर आवें दीदा ओ दिल फ़र्श-ए-राह
ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले
ग़ालिब
हवस-ए-गुल के तसव्वुर में भी खटका न रहा
ग़ालिब
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या
ग़ालिब