Couplets Poetry (page 524)
अक़्ल के भटके होऊँ को राह दिखलाते हुए
आनंद नारायण मुल्ला
अब बन के फ़लक-ज़ाद दिखाते हैं हमें आँख
आनंद नारायण मुल्ला
अब और इस से सिवा चाहते हो क्या 'मुल्ला'
आनंद नारायण मुल्ला
अब और इस के सिवा चाहते हो क्या 'मुल्ला'
आनंद नारायण मुल्ला
आईना-ए-रंगीन जिगर कुछ भी नहीं क्या
आनंद नारायण मुल्ला
ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है
अम्न लख़नवी
ज़मीं पर हैं वो कुछ मिट्टी के पुतले
अम्न लख़नवी
ज़माने की कशाकश का दिया पैहम पता मुझ को
अम्न लख़नवी
ज़बान ओ दहन से जो खुलते नहीं हैं
अम्न लख़नवी
तुम्हारी बज़्म भी क्या बज़्म है आदाब हैं कैसे
अम्न लख़नवी
मुकम्मल दास्ताँ का इख़्तिसार इतना ही काफ़ी है
अम्न लख़नवी
कहानी अपनी अपनी अहल-ए-महफ़िल जब सुनाते हैं
अम्न लख़नवी
उस ने नासूर कर लिया होगा
अम्मार इक़बाल
मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर
अम्मार इक़बाल
मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
अम्मार इक़बाल
मैं आईनों को देखे जा रहा था
अम्मार इक़बाल
ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही
अम्मार इक़बाल
कैसे कैसे बना दिए चेहरे
अम्मार इक़बाल
कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'
अम्मार इक़बाल
एक ही बात मुझ में अच्छी है
अम्मार इक़बाल
एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
अम्मार इक़बाल
तुझ से मिरा मुआमला होता ब-राह-ए-रास्त
अमजद शहज़ाद
धुल जाते हैं इक दिन आख़िर जैसे भी हों दाग़
अमजद शहज़ाद
ये जो हासिल हमें हर शय की फ़रावानी है
अमजद इस्लाम अमजद
वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
अमजद इस्लाम अमजद
उस ने आहिस्ता से जब पुकारा मुझे
अमजद इस्लाम अमजद
उस के लहजे में बर्फ़ थी लेकिन
अमजद इस्लाम अमजद
सुना है कानों के कच्चे हो तुम बहुत सो हम
अमजद इस्लाम अमजद
सवाल ये है कि आपस में हम मिलें कैसे
अमजद इस्लाम अमजद
साए ढलने चराग़ जलने लगे
अमजद इस्लाम अमजद