Couplets Poetry (page 583)
मेरी कम-गोई पे जो तंज़ किया करते हैं
अहमद अशफ़ाक़
लगता है कि इस दिल में कोई क़ैद है 'अश्फ़ाक़'
अहमद अशफ़ाक़
किसी की शख़्सियत मजरूह कर दी
अहमद अशफ़ाक़
फ़ासले ये सिमट नहीं सकते
अहमद अशफ़ाक़
चीख़ उठता है दफ़अतन किरदार
अहमद अशफ़ाक़
बिकता रहता सर-ए-बाज़ार कई क़िस्तों में
अहमद अशफ़ाक़
बहुत बईद न था मसअलों का हल होना
अहमद अशफ़ाक़
अजब ठहराव पैदा हो रहा है रोज़ ओ शब में
अहमद अशफ़ाक़
अब किसी ख़्वाब की ताबीर नहीं चाहता मैं
अहमद अशफ़ाक़
सुना ये है बना करते हैं जोड़े आसमानों पर
अहमद अल्वी
ज़िंदगी उस ने बदल कर मिरी रख दी ऐसी
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
समझ रहा था जिसे ख़ैर-ख़्वाह मैं अपना
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
रूठने और मनाने के एहसास में है इक कैफ़-ओ-सुरूर
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
इस हाल में कब तक यूँही घुट घुट के जियूँगा
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
चप्पा चप्पा उस की गली का रहा है मेरे ज़ेर-ए-क़दम
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
अब मैं हूँ और ख़्वाब-ए-परेशाँ है मेरे साथ
अहमद अली बर्क़ी आज़मी
वो ख़्वाब जिस पे तीरा-शबी का गुमान था
आग़ाज़ बरनी
उसे सुलझाऊँ कैसे
आग़ाज़ बरनी
क़द का अंदाज़ा तुम्हें हो जाएगा
आग़ाज़ बरनी
मिरे एहसास के आतिश-फ़िशाँ का
आग़ाज़ बरनी
मैं तो बस ये चाहता हूँ वस्ल भी
आग़ाज़ बरनी
मैं ख़ुद से छुपा लेकिन
आग़ाज़ बरनी
ऐ शब-ए-ग़म मिरे मुक़द्दर की
आग़ाज़ बरनी
अब अगर इश्क़ के आसार नहीं बदलेंगे
आग़ाज़ बरनी
तुम कहाँ वस्ल कहाँ वस्ल की उम्मीद कहाँ
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
पामाल कर के पूछते हैं किस अदा से वो
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
पहले इस में इक अदा थी नाज़ था अंदाज़ था
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
मिलना न मिलना ये तो मुक़द्दर की बात है
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
लो हम बताएँ ग़ुंचा-ओ-गुल में है फ़र्क़ क्या
आग़ा शाएर क़ज़लबाश
किस तरह जवानी में चलूँ राह पे नासेह
आग़ा शाएर क़ज़लबाश