Couplets Poetry (page 581)
अभी तो जाग रहे हैं चराग़ राहों के
अहमद फ़राज़
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
अहमद फ़राज़
अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह
अहमद फ़राज़
अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा
अहमद फ़राज़
अब तो ये आरज़ू है कि वो ज़ख़्म खाइए
अहमद फ़राज़
अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं
अहमद फ़राज़
अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए
अहमद फ़राज़
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उमीदें
अहमद फ़राज़
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
अहमद फ़राज़
अब दिल की तमन्ना है तो ऐ काश यही हो
अहमद फ़राज़
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
अहमद फ़राज़
आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
अहमद फ़राज़
आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
अहमद फ़राज़
आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
अहमद फ़राज़
यूँ दर्द ने उम्मीद के लड़ से मुझे बाँधा
अहमद फ़क़ीह
वो जाता रहा और मैं कुछ बोल न पाया
अहमद फ़क़ीह
अहल-ए-ख़िरद इसे न समझ पाएँगे 'फ़क़ीह'
अहमद फ़क़ीह
आज मुझे अपनी आँखों से उस के क़ुर्ब की ख़ुशबू आई
अहमद फ़क़ीह
दीवार-ए-कुहन के ज़ेर-ए-साया
अहमद अज़ीमाबादी
उन से भी पूछिए कभी अपनी ज़मीं का कर्ब
अहमद अज़ीम
तू ने भी सारे ज़ख़्म किसी तौर सह लिए
अहमद अज़ीम
सड़क के पार चला जा रहा है बचता हुआ
अहमद अज़ीम
सब मोजज़ों के बाब में ये मोजज़ा भी हो
अहमद अज़ीम
क्या ढूँडने निकली है किसी क़ैस को पागल
अहमद अज़ीम
इसी लिए तो हार का हुआ नहीं मलाल तक
अहमद अज़ीम
धुँद में खो के रह गईं सूरतें मेहर-ओ-माह सी
अहमद अज़ीम
बाज़ार-ए-आरज़ू में कटी जा रही है उम्र
अहमद अज़ीम
ऐ शाम-ए-हिज्र-ए-यार मिरी तू गवाही दे
अहमद अज़ीम
आहन ओ संग को ज़हराब-ए-फ़ना चाट गया
अहमद अज़ीम