Couplets Poetry (page 579)

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो

अहमद फ़राज़

कभी 'फ़राज़' से आ कर मिलो जो वक़्त मिले

अहमद फ़राज़

जुज़ तिरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे

अहमद फ़राज़

जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र

अहमद फ़राज़

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया

अहमद फ़राज़

जो ग़ज़ल आज तिरे हिज्र में लिक्खी है वो कल

अहमद फ़राज़

जो ग़ैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए

अहमद फ़राज़

जिस से ये तबीअत बड़ी मुश्किल से लगी थी

अहमद फ़राज़

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो

अहमद फ़राज़

जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो

अहमद फ़राज़

जब भी दिल खोल के रोए होंगे

अहमद फ़राज़

जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर

अहमद फ़राज़

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब

अहमद फ़राज़

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

अहमद फ़राज़

इस से बढ़ कर कोई इनआम-ए-हुनर क्या है 'फ़राज़'

अहमद फ़राज़

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

अहमद फ़राज़

इस अहद-ए-ज़ुल्म में मैं भी शरीक हूँ जैसे

अहमद फ़राज़

हम तिरे शौक़ में यूँ ख़ुद को गँवा बैठे हैं

अहमद फ़राज़

हम को उस शहर में तामीर का सौदा है जहाँ

अहमद फ़राज़

हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा

अहमद फ़राज़

हम अगर मंज़िलें न बन पाए

अहमद फ़राज़

हुजूम ऐसा कि राहें नज़र नहीं आतीं

अहमद फ़राज़

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बाद ये मालूम

अहमद फ़राज़

हो दूर इस तरह कि तिरा ग़म जुदा न हो

अहमद फ़राज़

हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग

अहमद फ़राज़

हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद

अहमद फ़राज़

हँसी-ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है

अहमद फ़राज़

हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

अहमद फ़राज़

हमेशा के लिए मुझ से बिछड़ जा

अहमद फ़राज़

हमें भी अर्ज़-ए-तमन्ना का ढब नहीं आता

अहमद फ़राज़