Couplets Poetry (page 578)

न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है

अहमद फ़राज़

न मिरे ज़ख़्म खिले हैं न तिरा रंग-ए-हिना

अहमद फ़राज़

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं

अहमद फ़राज़

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं

अहमद फ़राज़

मुन्सिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे

अहमद फ़राज़

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

अहमद फ़राज़

मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर

अहमद फ़राज़

'मीर' के मानिंद अक्सर ज़ीस्त करता था 'फ़राज़'

अहमद फ़राज़

मेरी ख़ातिर न सही अपनी अना की ख़ातिर

अहमद फ़राज़

मर गए प्यास के मारे तो उठा अब्र-ए-करम

अहमद फ़राज़

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते

अहमद फ़राज़

मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया

अहमद फ़राज़

मैं क्या करूँ मिरे क़ातिल न चाहने पर भी

अहमद फ़राज़

मैं ख़ुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले

अहमद फ़राज़

मैं भी पलकों पे सजा लूँगा लहू की बूँदें

अहमद फ़राज़

मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब

अहमद फ़राज़

लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र

अहमद फ़राज़

ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें

अहमद फ़राज़

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से

अहमद फ़राज़

कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं

अहमद फ़राज़

कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी जैसे

अहमद फ़राज़

कितने नादाँ हैं तिरे भूलने वाले कि तुझे

अहमद फ़राज़

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

अहमद फ़राज़

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

अहमद फ़राज़

किसी दुश्मन का कोई तीर न पहुँचा मुझ तक

अहमद फ़राज़

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ 'फ़राज़' कब तक

अहमद फ़राज़

किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी

अहमद फ़राज़

किस को बिकना था मगर ख़ुश हैं कि इस हीले से

अहमद फ़राज़

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

अहमद फ़राज़

कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र

अहमद फ़राज़