Couplets Poetry (page 577)
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
अहमद फ़राज़
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी
अहमद फ़राज़
तअ'ना-ए-नश्शा न दो सब को कि कुछ सोख़्ता-जाँ
अहमद फ़राज़
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
अहमद फ़राज़
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
अहमद फ़राज़
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
अहमद फ़राज़
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
अहमद फ़राज़
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
अहमद फ़राज़
सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया
अहमद फ़राज़
सितम तो ये है कि ज़ालिम सुख़न-शनास नहीं
अहमद फ़राज़
सिलवटें हैं मिरे चेहरे पे तो हैरत क्यूँ है
अहमद फ़राज़
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
अहमद फ़राज़
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही
अहमद फ़राज़
शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर
अहमद फ़राज़
साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले
अहमद फ़राज़
साक़ी ये ख़मोशी भी तो कुछ ग़ौर-तलब है
अहमद फ़राज़
सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की
अहमद फ़राज़
साए हैं अगर हम तो हो क्यूँ हम से गुरेज़ाँ
अहमद फ़राज़
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
अहमद फ़राज़
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
अहमद फ़राज़
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
अहमद फ़राज़
रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गई
अहमद फ़राज़
रात भर हँसते हुए तारों ने
अहमद फ़राज़
क़ुर्बतें लाख ख़ूब-सूरत हों
अहमद फ़राज़
क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का
अहमद फ़राज़
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
अहमद फ़राज़
पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है
अहमद फ़राज़
नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है
अहमद फ़राज़
न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
अहमद फ़राज़
न तेरा क़ुर्ब न बादा है क्या किया जाए
अहमद फ़राज़