Couplets Poetry (page 576)
ज़िंदगी फैली हुई थी शाम-ए-हिज्राँ की तरह
अहमद फ़राज़
ज़िंदगी पर इस से बढ़ कर तंज़ क्या होगा 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
अहमद फ़राज़
यूँ तो पहले भी हुए उस से कई बार जुदा
अहमद फ़राज़
ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
अहमद फ़राज़
ये किन नज़रों से तू ने आज देखा
अहमद फ़राज़
ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
अहमद फ़राज़
ये दिल का दर्द तो उम्रों का रोग है प्यारे
अहमद फ़राज़
ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है
अहमद फ़राज़
याद आई है तो फिर टूट के याद आई है
अहमद फ़राज़
वो वक़्त आ गया है कि साहिल को छोड़ कर
अहमद फ़राज़
वो सामने हैं मगर तिश्नगी नहीं जाती
अहमद फ़राज़
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद
अहमद फ़राज़
वो जिस घमंड से बिछड़ा गिला तो इस का है
अहमद फ़राज़
वो अपने ज़ोम में था बे-ख़बर रहा मुझ से
अहमद फ़राज़
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अहमद फ़राज़
उस का क्या है तुम न सही तो चाहने वाले और बहुत
अहमद फ़राज़
उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
अहमद फ़राज़
उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है
अहमद फ़राज़
टूटा तो हूँ मगर अभी बिखरा नहीं 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'
अहमद फ़राज़
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त
अहमद फ़राज़
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
अहमद फ़राज़
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
अहमद फ़राज़
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
अहमद फ़राज़
तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
अहमद फ़राज़
तेरी बातें ही सुनाने आए
अहमद फ़राज़
तेरे क़ामत से भी लिपटी है अमर-बेल कोई
अहमद फ़राज़
तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
अहमद फ़राज़