Couplets Poetry (page 59)
लम्हा-दर-लम्हा गुज़रता ही चला जाता है
तनवीर अहमद अल्वी
फिर मिरा ध्यान ज्ञान टूट गया
तालिब हुसैन तालिब
माल-ओ-ज़र की क़द्र क्या? ख़ून-ए-जिगर के सामने
तालिब हुसैन तालिब
मैं चाँद भेज रहा हूँ कि तुम को देख आए
तालिब हुसैन तालिब
किसी का मिलना, बिछड़ना और एक दो बातें
तालिब हुसैन तालिब
देख कर तुम को हैरती हूँ मैं
तालिब हुसैन तालिब
आज फिर चाँद देर से निकला
तालिब हुसैन तालिब
यूँ भी तिरा एहसान है आने के लिए आ
तालिब बाग़पती
दुनिया से मैं ने भी कोई रग़बत नहीं रखी
तालिब अंसारी
वस्ल में भी नहीं मजाल-ए-सुख़न
तालिब अली खान ऐशी
कोई इस फ़स्ल में दीवाना हुआ है शायद
तालिब अली खान ऐशी
कौन पाबंद-ए-जुनूँ फ़स्ल-ए-बहाराँ में न था
तालिब अली खान ऐशी
कम हुई बाँग-ए-जरस भी या-रब
तालिब अली खान ऐशी
ये तेरा दिवाना रात गए मालूम नहीं क्यूँ पहरों तक
तालीफ़ हैदर
ये शहर अपनी इसी हाव-हू से ज़िंदा है
तालीफ़ हैदर
वो एक लम्हा जिसे तुम ने मुख़्तसर जाना
तालीफ़ हैदर
उसे कहाँ हमें क़ैदी बना के रखना था
तालीफ़ हैदर
तो क्यूँ इस बार उस ने मेरे आगे सर झुकाया है
तालीफ़ हैदर
सफ़र ही बस कार-ए-ज़िंदगी है
तालीफ़ हैदर
किस की आँखों का नशा है कि मिरे होंटों को
तालीफ़ हैदर
ख़ुदा वजूद में है आदमी के होने से
तालीफ़ हैदर
ख़िरद नहीं है यहाँ बस जुनून का सौदा
तालीफ़ हैदर
इस तरह तुझे इश्क़ किया है कि ये दुनिया
तालीफ़ हैदर
इंकार भी करने का बहाना नहीं मिलता
तालीफ़ हैदर
अक्सर मिरे शेरों की सना करते रहे हैं
तालीफ़ हैदर
उफ़ वो नज़र कि सब के लिए दिल-नवाज़ है
ताजवर नजीबाबादी
नज़र भर के जो देख सकते हैं तुझ को
ताजवर नजीबाबादी
ख़ुदा मुझ को तुझ से ही महरूम कर दे
ताजवर नजीबाबादी
कहीं रुस्वा न हों रंगीनियाँ दर्द-ए-मोहब्बत की
ताजवर नजीबाबादी
जिंस-ए-हुनर मज़ाक़-ए-ख़रीदार देख कर
ताजवर नजीबाबादी