Couplets Poetry (page 61)
वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं
तहज़ीब हाफ़ी
तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
तहज़ीब हाफ़ी
तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ
तहज़ीब हाफ़ी
सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को
तहज़ीब हाफ़ी
पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे
तहज़ीब हाफ़ी
मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ
तहज़ीब हाफ़ी
मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
तहज़ीब हाफ़ी
मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ
तहज़ीब हाफ़ी
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
तहज़ीब हाफ़ी
इस लिए रौशनी में ठंडक है
तहज़ीब हाफ़ी
इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे
तहज़ीब हाफ़ी
दास्ताँ हूँ मैं इक तवील मगर
तहज़ीब हाफ़ी
बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता
तहज़ीब हाफ़ी
अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ
तहज़ीब हाफ़ी
आसमाँ और ज़मीं की वुसअत देख
तहज़ीब हाफ़ी
ये तय हुआ है कि शेर ओ अदब के पैमाने
तहसीन फ़िराक़ी
सतह-ए-दरिया का ये सफ़्फ़ाक सुकूँ है धोका
तहसीन फ़िराक़ी
फिर उस की याद ने दस्तक दिल-ए-हज़ीं पर दी
तहसीन फ़िराक़ी
मुझ सा अंजान किसी मोड़ पे खो सकता है
तहसीन फ़िराक़ी
मैं कहाँ और कहाँ शाएरी मैं ने तो फ़क़त
तहसीन फ़िराक़ी
मैं जिन गलियों में पैहम बरसर-ए-गर्दिश रहा हूँ
तहसीन फ़िराक़ी
बहार अब के जो गुज़री तो फिर न आएगी
तहसीन फ़िराक़ी
ये आँख नम थी ज़बाँ पर मगर सवाल न था
ताहिरा जबीन तारा
सजा लिया है हथेली पे हम ने उस का नाम
ताहिरा जबीन तारा
मिल के लगा है आज ज़माने ठहर गए
ताहिरा जबीन तारा
ये जो माज़ी की बात करते हैं
ताहिर अज़ीम
तुम हमारे ख़ून की क़ीमत न पूछो
ताहिर अज़ीम
तीरगी की क्या अजब तरकीब है ये
ताहिर अज़ीम
तासीर नहीं रहती अल्फ़ाज़ की बंदिश में
ताहिर अज़ीम
सोच अपनी ज़ात तक महदूद है
ताहिर अज़ीम