Couplets Poetry (page 63)

हुस्न और इश्क़ दोनों में तफ़रीक़ है पर इन्हीं दोनों पे मेरा ईमान है

ताबिश कानपुरी

ज़माने से अलग थी मेरी दुनिया

ताबिश कमाल

यक़ीं से जो गुमाँ का फ़ासला है

ताबिश कमाल

उतर गया है रग-ओ-पय में ज़ाइक़ा उस का

ताबिश कमाल

न देखें तो सुकूँ मिलता नहीं है

ताबिश कमाल

कोई इज़हार कर सकता है कैसे

ताबिश कमाल

कई पड़ाव थे मंज़िल की राह में 'ताबिश'

ताबिश कमाल

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है

ताबिश कमाल

जिस ने इंसाँ से मोहब्बत ही नहीं की 'ताबिश'

ताबिश कमाल

हम उस धरती के बाशिंदे थे 'ताबिश'

ताबिश कमाल

अजब यक़ीन सा उस शख़्स के गुमान में था

ताबिश कमाल

ज़र्रे में गुम हज़ार सहरा

ताबिश देहलवी

शाहों की बंदगी में सर भी नहीं झुकाया

ताबिश देहलवी

छोटी पड़ती है अना की चादर

ताबिश देहलवी

अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी

ताबिश देहलवी

आईना जब भी रू-ब-रू आया

ताबिश देहलवी

ये मय-कदा है कलीसा ओ ख़ानक़ाह नहीं

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ये चार दिन की रिफ़ाक़त भी कम नहीं ऐ दोस्त

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

यादों के साए हैं न उमीदों के हैं चराग़

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

उधर चमन में ज़र-ए-गुल लुटा इधर 'ताबाँ'

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

तबाहियों का तो दिल की गिला नहीं लेकिन

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

रह-ए-तलब में किसे आरज़ू-ए-मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

निखर गए हैं पसीने में भीग कर आरिज़

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मेरे अफ़्कार की रानाइयाँ तेरे दम से

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मंज़िलें राह में थीं नक़्श-ए-क़दम की सूरत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मैं ने कब दावा-ए-इल्हाम किया है 'ताबाँ'

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

लब-ए-निगार को ज़हमत न दो ख़ुदा के लिए

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

किसी के हाथ में जाम-ए-शराब आया है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

जुनूँ में और ख़िरद में दर-हक़ीक़त फ़र्क़ इतना है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ