Couplets Poetry (page 65)

न थे आशिक़ किसी बे-दाद पर हम जब तलक 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

न जा वाइज़ की बातों पर हमेशा मय को पी 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

मुझ से बीमार है मिरा ज़ालिम

ताबाँ अब्दुल हई

मुझे आता है रोना ऐसी तन्हाई पे ऐ 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

मोहब्बत तू मत कर दिल उस बेवफ़ा से

ताबाँ अब्दुल हई

मलूँ हों ख़ाक जूँ आईना मुँह पर

ताबाँ अब्दुल हई

मैं तो तालिब दिल से हूँगा दीन का

ताबाँ अब्दुल हई

मैं हो के तिरे ग़म से नाशाद बहुत रोया

ताबाँ अब्दुल हई

महफ़िल के बीच सुन के मिरे सोज़-ए-दिल का हाल

ताबाँ अब्दुल हई

ले मेरी ख़बर चश्म मिरे यार की क्यूँ-कर

ताबाँ अब्दुल हई

किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें

ताबाँ अब्दुल हई

ख़्वान-ए-फ़लक पे नेमत-ए-अलवान है कहाँ

ताबाँ अब्दुल हई

ख़ुदा देवे अगर क़ुदरत मुझे तो ज़िद है ज़ाहिद की

ताबाँ अब्दुल हई

करता है गर तू बुत-शिकनी तो समझ के कर

ताबाँ अब्दुल हई

कर क़त्ल मुझे उन ने आलम में बहुत ढूँडा

ताबाँ अब्दुल हई

कई फ़ाक़ों में ईद आई है

ताबाँ अब्दुल हई

कई बारी बिना हो जिस की फिर कहते हैं टूटेगा

ताबाँ अब्दुल हई

कब पिलावेगा तू ऐ साक़ी मुझे जाम-ए-शराब

ताबाँ अब्दुल हई

जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब

ताबाँ अब्दुल हई

जब तलक रहे जीता चाहिए हँसे बोले

ताबाँ अब्दुल हई

इन बुतों को तो मिरे साथ मोहब्बत होती

ताबाँ अब्दुल हई

ईमान ओ दीं से 'ताबाँ' कुछ काम नहीं है हम को

ताबाँ अब्दुल हई

हो रूह के तईं जिस्म से किस तरह मोहब्बत

ताबाँ अब्दुल हई

हिज्र में उस बुत-ए-काफ़िर के तड़पते हैं पड़े

ताबाँ अब्दुल हई

हवा भी इश्क़ की लगने न देता मैं उसे हरगिज़

ताबाँ अब्दुल हई

हरम को छोड़ रहूँ क्यूँ न बुत-कदे में शैख़

ताबाँ अब्दुल हई

हमारे मय-कदे में हैं जो कुछ की निय्यतें ज़ाहिर

ताबाँ अब्दुल हई

है क्या सबब कि यार न आया ख़बर के तईं

ताबाँ अब्दुल हई

ग़ज़ालों को तिरी आँखें से कुछ निस्बत नहीं हरगिज़

ताबाँ अब्दुल हई

गर्म अज़-बस-कि है बाज़ार-ए-बुताँ ऐ ज़ाहिद

ताबाँ अब्दुल हई