Couplets Poetry (page 66)
एक बुलबुल भी चमन में न रही अब की फ़सल
ताबाँ अब्दुल हई
दुनिया कि नेक ओ बद से मुझे कुछ ख़बर नहीं
ताबाँ अब्दुल हई
दूँ सारी ख़ुदाई को एवज़ उन के मैं 'ताबाँ'
ताबाँ अब्दुल हई
दिल की हसरत न रही दिल में मिरे कुछ बाक़ी
ताबाँ अब्दुल हई
देख क़ासिद को मिरे यार ने पूछा 'ताबाँ'
ताबाँ अब्दुल हई
दर्द-ए-सर है ख़ुमार से मुझ को
ताबाँ अब्दुल हई
बुरा न मानियो मैं पूछता हूँ ऐ ज़ालिम
ताबाँ अब्दुल हई
ब'अद मुद्दत के माह-रू आया
ताबाँ अब्दुल हई
ऐ मर्द-ए-ख़ुदा हो तू परस्तार बुताँ का
ताबाँ अब्दुल हई
अगर तू शोहरा-ए-आफ़ाक़ है तो तेरे बंदों में
ताबाँ अब्दुल हई
आतिश-ए-इश्क़ में जो जल न मरें
ताबाँ अब्दुल हई
आता नहीं वो यार-ए-सितमगर तो क्या हुआ
ताबाँ अब्दुल हई
आता है मोहतसिब पए-ताज़ीर मय-कशो
ताबाँ अब्दुल हई
आइने को तिरी सूरत से न हो क्यूँ कर हैरत
ताबाँ अब्दुल हई
आईना रू-ब-रू रख और अपनी छब दिखाना
ताबाँ अब्दुल हई
मैं किस लिए तुझे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई दूँ
ताब असलम
ग़ज़ब तो ये है मुक़ाबिल खड़ा है वो मेरे
ताब असलम
वो खड़े कहते हैं मेरी लाश पर
तअशशुक़ लखनवी
वो इंतिहा के हैं नाज़ुक मैं सख़्त-जाँ हूँ कमाल
तअशशुक़ लखनवी
वहशत-ए-दिल ये बढ़ी छोड़ दिए घर सब ने
तअशशुक़ लखनवी
उठते जाते हैं बज़्म-ए-आलम से
तअशशुक़ लखनवी
तमाम उम्र कमी की कभी न पानी ने
तअशशुक़ लखनवी
शोला-ए-हुस्न से था दूद-ए-दिल अपना अव्वल
तअशशुक़ लखनवी
क़ाफ़िले रात को आते थे उधर जान के आग
तअशशुक़ लखनवी
पड़ गई क्या निगह-ए-मस्त तिरे साक़ी की
तअशशुक़ लखनवी
नज्द से जानिब-ए-लैला जो हवा आती है
तअशशुक़ लखनवी
मुंतज़िर तेरे हैं चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ खोले हुए
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से लाखों ख़ाक के पुतले बना सकता है तू
तअशशुक़ लखनवी
मुझ से क्या पूछते हो दाग़ हैं दिल में कितने
तअशशुक़ लखनवी
मुझे है फ़िक्र ख़त भेजा है जब से उस गुल-ए-तर को
तअशशुक़ लखनवी