Couplets Poetry (page 68)

ये किस ज़ोहरा-जबीं की अंजुमन में आमद आमद है

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

वाइ'ज़ ओ शैख़ सभी ख़ूब हैं क्या बतलाऊँ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

वही माबूद है 'नाज़िम' जो है महबूब अपना

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

उस बुत का कूचा मस्जिद-ए-जामे नहीं है शैख़

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

शाएर बने नदीम बने क़िस्सा-ख़्वाँ बने

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

शबिस्ताँ में रहो बाग़ों में खेलो मुझ से क्यूँ पूछो

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

सँभाल वाइ'ज़ ज़बान अपनी ख़ुदा से डरा इक ज़रा हया कर

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

साहिल पर आ के लगती है टक्कर सफ़ीने को

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

रोज़ा रखता हूँ सुबूही पी के हंगाम-ए-सहर

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

रोने ने मिरे सैकड़ों घर ढा दिये लेकिन

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

पुर्सिश को अगर होंट तुम्हारे नहीं हिलते

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

फूँक दो याँ गर ख़स-ओ-ख़ाशाक हैं

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

'नाज़िम' ये इंतिज़ाम रिआ'यत है नाम की

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

न बुज़ला-संज न शाएर न शोख़-तब्अ रक़ीब

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मुहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

क्या मेरे काम से है रवाई को दुश्मनी

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

क्या खाएँ हम वफ़ा में अब ईमान की क़सम

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कुफ़्र-ओ-ईमाँ से है क्या बहस इक तमन्ना चाहिए

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ख़रीदारी है शहद ओ शीर ओ क़स्र ओ हूर ओ ग़िल्माँ की

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कम समझते नहीं हम ख़ुल्द से मयख़ाने को

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कहते हो सब कि तुझ से ख़फ़ा हो गया है यार

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कहते हैं छुप के रात को पीता है रोज़ मय

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जुम्बिश अबरू को है लेकिन नहीं आशिक़ पे निगाह

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जाती नहीं है सई रह-ए-आशिक़ी में पेश

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जब तिरा नाम सुना तो नज़र आया गोया

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जब गुज़रती है शब-ए-हिज्र मैं जी उठता हूँ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ईद के दिन जाइए क्यूँ ईद-गाह

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ईद है हम ने भी जाना कि न होती गर ईद

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

हक़ ये है कि का'बे की बिना भी न पड़ी थी

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

है रिश्ता एक फिर ये कशाकश न चाहिए

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम