Couplets Poetry (page 64)

जनाब-ए-शैख़ समझते हैं ख़ूब रिंदों को

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

हमारी तरह ख़राब-ए-सफ़र न हो कोई

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ग़ुबार-ए-राह चला साथ ये भी क्या कम है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ग़म-ए-ज़िंदगी इक मुसलसल अज़ाब

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

छटे ग़ुबार-ए-नज़र बाम-ए-तूर आ जाए

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

बस्तियों में होने को हादसे भी होते हैं

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

बड़े बड़ों के क़दम डगमगा गए 'ताबाँ'

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

आँसुओं से कोई आवाज़ को निस्बत न सही

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

ज़ाहिद तिरा तो दीन सरासर फ़रेब है

ताबाँ अब्दुल हई

ज़ाहिद हो और तक़्वा आबिद हो और मुसल्ला

ताबाँ अब्दुल हई

ये जो हैं अहल-ए-रिया आज फ़क़ीरों के बीच

ताबाँ अब्दुल हई

यार से अब के गर मिलूँ 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

यार रूठा है मिरा उस को मनाऊँ किस तरह

ताबाँ अब्दुल हई

यहाँ यार और बरदार कोई नहीं किसी का

ताबाँ अब्दुल हई

वो तो सुनता नहीं किसी की बात

ताबाँ अब्दुल हई

वे शख़्स जिन से फ़ख़्र जहाँ को था अब वे हाए

ताबाँ अब्दुल हई

तुम इस क़दर जो निडर हो के ज़ुल्म करते हो

ताबाँ अब्दुल हई

तू मिल उस से हो जिस से दिल तिरा ख़ुश

ताबाँ अब्दुल हई

तू कौन है ऐ वाइज़ जो मुझ को डराता है

ताबाँ अब्दुल हई

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

ताबाँ अब्दुल हई

तिरी बात लावे जो पैग़ाम-बर

ताबाँ अब्दुल हई

तक रहा है ये कोई सोने की चिड़िया आ फँसे

ताबाँ अब्दुल हई

'ताबाँ' ज़ि-बस हवा-ए-जुनूँ सर में है मिरे

ताबाँ अब्दुल हई

सुने क्यूँ-कर वो लब्बैक-ए-हरम को

ताबाँ अब्दुल हई

सोहबत-ए-शैख़ में तू रात को जाया मत कर

ताबाँ अब्दुल हई

सफ़र दुनिया से करना क्या है 'ताबाँ'

ताबाँ अब्दुल हई

रिंद वाइज़ से क्यूँ कि सरबर हो

ताबाँ अब्दुल हई

क़िस्मत में क्या है देखें जीते बचें कि मर जाएँ

ताबाँ अब्दुल हई

फिर मेहरबाँ हुआ है 'ताबाँ' मिरा सितमगर

ताबाँ अब्दुल हई

नेमत-ए-अल्वान भी ख़्वान-ए-फ़लक की देख ली

ताबाँ अब्दुल हई