Couplets Poetry (page 57)
एक मुद्दत से ये मंज़र नहीं बदला 'तारिक़'
तारिक़ क़मर
अजब ग़रीबी के आलम में मर गया इक शख़्स
तारिक़ क़मर
अभी बाक़ी है बिछड़ना उस से
तारिक़ क़मर
ज़मीन इतनी नहीं है कि पाँव रख पाएँ
तारिक़ नईम
ये वीरानी सी यूँही तो नहीं रहती है आँखों में
तारिक़ नईम
ये ख़याल था कभी ख़्वाब में तुझे देखते
तारिक़ नईम
वो आईना है तो हैरत किसी जमाल की हो
तारिक़ नईम
उठा उठा के तिरे नाज़ ऐ ग़म-ए-दुनिया
तारिक़ नईम
तिरे ख़याल की लौ ही सफ़र में काम आई
तारिक़ नईम
रात रो रो के गुज़ारी है चराग़ों की तरह
तारिक़ नईम
कोई कब दीवार बना है मेरे सफ़र में
तारिक़ नईम
किनारा कर न ऐ दुनिया मिरी हस्त-ए-ज़बूनी से
तारिक़ नईम
ख़ुश-अर्ज़ानी हुई है इस क़दर बाज़ार-ए-हस्ती में
तारिक़ नईम
खोल देते हैं पलट आने पे दरवाज़ा-ए-दिल
तारिक़ नईम
जमाल मुझ पे ये इक दिन में तो नहीं आया
तारिक़ नईम
बे-वज्ह न बदले थे मुसव्विर ने इरादे
तारिक़ नईम
अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए
तारिक़ नईम
अजब नहीं दर-ओ-दीवार जैसे हो जाएँ
तारिक़ नईम
अभी तो मंसब-ए-हस्ती से मैं हटा ही नहीं
तारिक़ नईम
अभी फिर रहा हूँ मैं आप-अपनी तलाश में
तारिक़ नईम
अब आसमान भी कम पड़ रहे हैं उस के लिए
तारिक़ नईम
मौत बर-हक़ है तो फिर मौत से डरना कैसा
तारिक़ मतीन
कुछ और हो गई दुश्वार नेक-ओ-बद की तमीज़
तारिक़ मतीन
तेरी तो आन बढ़ गई मुझ को नवाज़ कर
तनवीर सिप्रा
'तनवीर' अब तू हल्क़ से भोंपू का काम ले
तनवीर सिप्रा
शायद यूँही सिमट सकें घर की ज़रूरतें
तनवीर सिप्रा
सब की निगाह में तिरे गोदाम आ गए
तनवीर सिप्रा
मिल मालिक के कुत्ते भी चर्बीले हैं
तनवीर सिप्रा
मैं अपने बचपने में छू न पाया जिन खिलौनों को
तनवीर सिप्रा
कितना बोद है मेरे फ़न और पेशे के माबैन
तनवीर सिप्रा