Couplets Poetry (page 55)

सब्ज़ पेड़ों को पता तक नहीं चलता शायद

तौक़ीर तक़ी

रूठ कर आँख के अंदर से निकल जाते हैं

तौक़ीर तक़ी

फेंक दे ख़ुश्क फूल यादों के

तौक़ीर तक़ी

मैं तिरे हिज्र से निकलूँगा तो मर जाऊँगा

तौक़ीर तक़ी

लफ़्ज़ की क़ैद से रिहा हो जा

तौक़ीर तक़ी

कल जहाँ दीवार ही दीवार थी

तौक़ीर तक़ी

जैसे वीरान हवेली में हों ख़ामोश चराग़

तौक़ीर तक़ी

इन सुलगती हुई साँसों को नहीं देखते लोग

तौक़ीर तक़ी

हिज्र था बार-ए-अमानत की तरह

तौक़ीर तक़ी

हमारी राह में बैठेगी कब तक तेरी दुनिया

तौक़ीर तक़ी

दामन बचा रहे थे कि चेहरा भी जल गया

तौक़ीर तक़ी

बदन में रूह की तर्सील करने वाले लोग

तौक़ीर तक़ी

बदन में दिल था मुअल्लक़ ख़ला में नज़रें थीं

तौक़ीर तक़ी

अब ज़माने में मोहब्बत है तमाशे की तरह

तौक़ीर तक़ी

ज़रा सँभलूँ भी तो वो आँखों से पिला देता है

तौक़ीर अहमद

ज़बाँ ख़ामोश मगर नज़रों में उजाला देखा

तौक़ीर अहमद

यूँ अचानक न ज़ुल्फ़ें बिखेरा करो

तौक़ीर अहमद

नादान मेरा दिल बहक जाए न कहीं

तौक़ीर अहमद

मज़ा तो इश्क़ का तब है कि एक पल को सही

तौक़ीर अहमद

इस क़दर टूट कर मेरी नज़रों में न देखो वर्ना

तौक़ीर अहमद

आज की रात मुझे होश में रहने दो अभी

तौक़ीर अहमद

वक़्त कर देगा फ़ैसला इस का

तौक़ीर अब्बास

फिर यही बात न मैं भूल सका

तौक़ीर अब्बास

मेरी आँखों में आ के राख हुआ

तौक़ीर अब्बास

लहू मेरी नसों में भी कभी का जम चुका था

तौक़ीर अब्बास

छोड़ आया था मेज़ पर चाय

तौक़ीर अब्बास

बहार दर्द भरा इक़्तिबास छोड़ गई

तौक़ीर अब्बास

रात मेरे पास तुझ को देख कर

तसनीम फ़ारूक़ी

चल कर कभी हमारे अंधेरे भी देखिए

तसनीम फ़ारूक़ी

ख़ुदा के नाम पे जिस तरह लोग मर रहे हैं

तसनीम आबिदी