Couplets Poetry (page 53)

हर तरफ़ फैला हुआ बे-सम्त बे-मंज़िल सफ़र

तुफ़ैल चतुर्वेदी

एक साए की तलब में ज़िंदगी पहुँची यहाँ

तुफ़ैल चतुर्वेदी

वक़्त के मक़्तल में हम हैं दोस्तो

तुफ़ैल बिस्मिल

फिर से बिखरी है तिरी ज़ुल्फ़ मिरे शानों पर

तुफ़ैल बिस्मिल

आवाज़ हूँ उभर के जो सहरा में खो गई

तुफ़ैल बिस्मिल

ये बारिश कब रुकेगी कौन जाने

त्रिपुरारि

उम्र भर लड़ता रहा हूँ उस से

त्रिपुरारि

तुम मिरे पास न आओ कि यही बेहतर है

त्रिपुरारि

तुम जिसे चाँद कहते हो वो अस्ल में

त्रिपुरारि

शेर पढ़ते हुए ये तुम ने कभी सोचा है

त्रिपुरारि

रूह है तर्जुमा पानियों का अगर

त्रिपुरारि

क़त्ल करना है नए ख़्वाब का सो डरता हूँ

त्रिपुरारि

प्यास ऐसी थी कि मैं सारा समुंदर पी गया

त्रिपुरारि

नींद आए तो कुछ सुराग़ मिले

त्रिपुरारि

मोहब्बत में शिकायत कर रहा हूँ

त्रिपुरारि

मैं तिरे जिस्म के जब पार निकल जाऊँगा

त्रिपुरारि

मैं हासिल हो चुका हूँ जिस बदन को

त्रिपुरारि

मैं अपने दरमियाँ से हट चुका हूँ

त्रिपुरारि

कितनी दिलकश हैं ये बारिश की फुवारें लेकिन

त्रिपुरारि

किसी पर भी यक़ीं कर लेते हो तुम

त्रिपुरारि

कई लाशें हैं मुझ में दफ़्न या'नी

त्रिपुरारि

जिसे तुम ढूँडती रहती हो मुझ में

त्रिपुरारि

जिन से मिलना न हुआ उन से बिछड़ कर रोए

त्रिपुरारि

जब से गुज़रा है किसी हुस्न के बाज़ार से दिल

त्रिपुरारि

एक तस्वीर बनाई है ख़यालों ने अभी

त्रिपुरारि

एक किरदार नया रोज़ जिया करता हूँ

त्रिपुरारि

ऐ हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो

त्रिपुरारि

क़रीब आ न सका मैं तिरे मगर ख़ुश हूँ

तिश्ना बरेलवी

बस यही इक काम बाक़ी था जो करना है मुझे

तिश्ना बरेलवी

यूँ तो बरसों न पिलाऊँ न पियूँ ऐ ज़ाहिद

तिलोकचंद महरूम