Couplets Poetry (page 51)

चला था मैं तो समुंदर की तिश्नगी ले कर

उर्फ़ी आफ़ाक़ी

वो हादसे भी दहर में हम पर गुज़र गए

उनवान चिश्ती

परेशाँ हो के दिल तर्क-ए-तअल्लुक़ पर है आमादा

उनवान चिश्ती

मिरी समझ में आ गया हर एक राज़-ए-ज़िंदगी

उनवान चिश्ती

मैं किस तरह तुझे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई दूँ

उनवान चिश्ती

कुछ तो बताओ ऐ फ़रज़ानो दीवानों पर क्या गुज़री

उनवान चिश्ती

इश्क़ फिर इश्क़ है आशुफ़्ता-सरी माँगे है

उनवान चिश्ती

इस कार-ए-नुमायाँ के शाहिद हैं चमन वाले

उनवान चिश्ती

हुस्न ही तो नहीं बेताब-ए-नुमाइश 'उनवाँ'

उनवान चिश्ती

आप से चूक हो गई शायद

उनवान चिश्ती

ये ख़ुद-फ़रेबी-ए-एहसास-ए-आरज़ू तो नहीं

उम्मीद फ़ाज़ली

वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

उम्मीद फ़ाज़ली

तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ

उम्मीद फ़ाज़ली

सुकूत वो भी मुसलसल सुकूत क्या मअनी

उम्मीद फ़ाज़ली

मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले

उम्मीद फ़ाज़ली

जब से 'उम्मीद' गया है कोई!!

उम्मीद फ़ाज़ली

जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब

उम्मीद फ़ाज़ली

जाने कब तूफ़ान बने और रस्ता रस्ता बिछ जाए

उम्मीद फ़ाज़ली

घर तो ऐसा कहाँ का था लेकिन

उम्मीद फ़ाज़ली

गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है

उम्मीद फ़ाज़ली

चमन में रखते हैं काँटे भी इक मक़ाम ऐ दोस्त

उम्मीद फ़ाज़ली

ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ

उम्मीद फ़ाज़ली

आसमानों से फ़रिश्ते जो उतारे जाएँ

उम्मीद फ़ाज़ली

उट्ठे जो तेरे दर से तो दुनिया सिमट गई

उमर फ़ारूक़

मुझे ख़रीद रहे हैं मिरे सभी अपने

उमर फ़ारूक़

मिरे मालिक मुझे इस ख़ाक से बे-घर न करना

उमर फ़ारूक़

हमें तो टूटी हुई कश्तियाँ नहीं दिखतीं

उमर फ़ारूक़

बदन का बोझ उठाना भी अब मुहाल हुआ

उमर फ़ारूक़

अब कू-ए-सनम चार क़दम ही का सफ़र है

उमर फ़ारूक़

जो न खुल सका तिरा भेद था

उमर फ़रहत