Couplets Poetry (page 49)

इतना हैरान न हो मेरी अना पर प्यारे

विपुल कुमार

इस से पहले कि ये आज़ार गवारा कर लें

विपुल कुमार

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

विपुल कुमार

हमीं ने हश्र उठा रक्खा है बिछड़ने पर

विपुल कुमार

इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए

विपुल कुमार

इक लम्हा-ए-फ़िराक़ पे वारा गया मुझे

विपुल कुमार

इक दिन तिरी गली में मुझे ले गई हवा

विपुल कुमार

दिलों पे दर्द का इम्कान भी ज़ियादा नहीं

विपुल कुमार

दिल भी अजीब ख़ाना-ए-वहदत-पसंद था

विपुल कुमार

बदन में आग है रोग़न मिरे ख़याल में है

विपुल कुमार

बचा के आँख बिछड़ जाएँ उस से चुपके से

विपुल कुमार

अब के मसरूफ़ियत-ए-इश्क़ बहुत है हम को

विपुल कुमार

रोज़ ही पीना रोज़ पिलाना रोज़ ग़मों से टकराना

विलास पंडित मुसाफ़िर

मेहनत कर के हम तो आख़िर भूके भी सो जाएँगे

विलास पंडित मुसाफ़िर

लेने वाले तो सभी कुछ ले गए

विलास पंडित मुसाफ़िर

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

ज़िंदगी की हँसी उड़ाती हुई

विकास शर्मा राज़

ये सदा काश उसी ने दी हो

विकास शर्मा राज़

यहाँ तक कर लिया मसरूफ़ ख़ुद को

विकास शर्मा राज़

उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था

विकास शर्मा राज़

तू भी नाराज़ बहुत है मुझ से

विकास शर्मा राज़

तन्हा होता हूँ तो मर जाता हूँ मैं

विकास शर्मा राज़

रोज़ ये ख़्वाब डराता है मुझे

विकास शर्मा राज़

रफ़्ता रफ़्ता क़ुबूल होंगे उसे

विकास शर्मा राज़

मुझ को अक्सर उदास करती है

विकास शर्मा राज़

मुद्दतें हो गईं हिसाब किए

विकास शर्मा राज़

मोहब्बत के आदाब सीखो ज़रा

विकास शर्मा राज़

मिरी उरूज की लिक्खी थी दास्ताँ जिस में

विकास शर्मा राज़

मेरी कोशिश तो यही है कि ये मा'सूम रहे

विकास शर्मा राज़

में अदम की पनाह-गाह में हूँ

विकास शर्मा राज़