Couplets Poetry (page 47)

कोई हंगामा-ए-हयात नहीं

वाहिद प्रेमी

कोई गर्दिश हो कोई ग़म हो कोई मुश्किल हो

वाहिद प्रेमी

किसी को बे-सबब शोहरत नहीं मिलती है ऐ 'वाहिद'

वाहिद प्रेमी

किस शान किस वक़ार से किस बाँकपन से हम

वाहिद प्रेमी

कभी न हुस्न-ओ-मोहब्बत में बन सकी 'वाहिद'

वाहिद प्रेमी

का'बा-ओ-दैर-ओ-कलीसा का तजस्सुस क्यूँ हो

वाहिद प्रेमी

इस तरह हुस्न-ओ-मोहब्बत की करो तुम तफ़्सीर

वाहिद प्रेमी

हम वो रह-रव हैं कि चलना ही है मस्लक जिन का

वाहिद प्रेमी

हुजूम-ए-ग़म से मिली है हयात-ए-नौ मुझ को

वाहिद प्रेमी

हक़ बात सर-ए-बज़्म भी कहने में तअम्मुल

वाहिद प्रेमी

है शाम-ए-अवध गेसू-ए-दिलदार का परतव

वाहिद प्रेमी

गुल ग़ुंचे आफ़्ताब शफ़क़ चाँद कहकशाँ

वाहिद प्रेमी

एक मुद्दत से इसी उलझन में हूँ

वाहिद प्रेमी

दिलों में ज़ख़्म होंटों पर तबस्सुम

वाहिद प्रेमी

बा'द तकलीफ़ के राहत है यक़ीनी 'वाहिद'

वाहिद प्रेमी

अपना नफ़स नफ़स है कि शो'ला कहें जिसे

वाहिद प्रेमी

अँधेरों में उजाले ढूँढता हूँ

वाहिद प्रेमी

आज़ाद तो बरसों से हैं अरबाब-ए-गुलिस्ताँ

वाहिद प्रेमी

आशियाँ जलने पे बुनियाद नई पड़ती है

वाहिद प्रेमी

उलझी थी जिन में एक ज़माने से ज़िंदगी

वहीदा नसीम

हम अजनबी हैं आज भी अपने दयार में

वहीदा नसीम

'वहीद' कार-ए-सियासत है कार-ए-बे-काराँ

वहीद क़ुरैशी

पहुँच गए हैं हम ऐसे दयार में कि 'वहीद'

वहीद क़ुरैशी

हम आज राह-ए-तमन्ना में जी को हार आए

वहीद क़ुरैशी

ज़ेर-ए-पा अब न ज़मीं है न फ़लक है सर पर

वहीद अख़्तर

याद आई न कभी बे-सर-ओ-सामानी में

वहीद अख़्तर

उम्र भर मिलते रहे फिर भी न मिलने पाए

वहीद अख़्तर

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए

वहीद अख़्तर

ठहरी है तो इक चेहरे पे ठहरी रही बरसों

वहीद अख़्तर

नींद बन कर मिरी आँखों से मिरे ख़ूँ में उतर

वहीद अख़्तर