Couplets Poetry (page 46)
हम ने आलम से बेवफ़ाई की
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
हर चंद 'वहशत' अपनी ग़ज़ल थी गिरी हुई
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
गर्दन झुकी हुई है उठाते नहीं हैं सर
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
दोनों ने किया है मुझ को रुस्वा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
दोनों ने बढ़ाई रौनक़-ए-हुस्न
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
दिल तोड़ दिया तुम ने मेरा अब जोड़ चुके तुम टूटे को
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
दिल को हम कब तक बचाए रखते हर आसेब से
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
छुपा न गोशा-नशीनी से राज़-ए-दिल 'वहशत'
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
बेजा है तिरी जफ़ा का शिकवा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
बज़्म में उस बे-मुरव्वत की मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
बढ़ा हंगामा-ए-शौक़ इस क़दर बज़्म-ए-हरीफ़ाँ में
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
बढ़ चली है बहुत हया तेरी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
अज़ीज़ अगर नहीं रखता न रख ज़लील ही रख
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
और इशरत की तमन्ना क्या करें
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ऐ मिशअल-ए-उम्मीद ये एहसान कम नहीं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ऐ अहल-ए-वफ़ा ख़ाक बने काम तुम्हारा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
अभी होते अगर दुनिया में 'दाग़'-ए-देहलवी ज़िंदा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
आँख में जल्वा तिरा दिल में तिरी याद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
आग़ाज़ से ज़ाहिर होता है अंजाम जो होने वाला है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
किस क़दर तुंद भरी है मिरे पैमाने में
वहीदुद्दीन सलीम
भला वो ख़ातिर-ए-आज़ुर्दा की तस्कीन क्या जानें
वहीदुद्दीन सलीम
वो और हैं किनारों पे पाते हैं जो सुकूँ
वाहिद प्रेमी
उफ़ गर्दिश-ए-हयात तिरी फ़ित्ना-साज़ियाँ
वाहिद प्रेमी
शख़्सिय्यत-ए-फ़नकार मुअ'म्मा नहीं 'वाहिद'
वाहिद प्रेमी
शब-ए-फ़िराक़ कई बार गोशा-ए-दिल से
वाहिद प्रेमी
राह-ए-तलब की लाख मसाफ़त गिराँ सही
वाहिद प्रेमी
न पूछिए कि शब-ए-हिज्र हम पे क्या गुज़री
वाहिद प्रेमी
मेरी दीवानगी-ए-इश्क़ है इक दर्स-ए-जहाँ
वाहिद प्रेमी
मैं औरों को क्या परखूँ आइना-ए-आलम में
वाहिद प्रेमी
क्यूँ शिकवा-ए-बे-मेहरी-ए-साक़ी है लबों पर
वाहिद प्रेमी