Couplets Poetry (page 48)

मिरी उड़ान अगर मुझ को नीचे आने दे

वहीद अख़्तर

मस्जिद हो मदरसा हो कि मज्लिस कि मय-कदा

वहीद अख़्तर

माँगने वालों को क्या इज़्ज़त ओ रुस्वाई से

वहीद अख़्तर

लेते हैं तिरा नाम ही यूँ जागते सोते

वहीद अख़्तर

किरनों से तराशा हुआ इक नूर का पैकर

वहीद अख़्तर

ख़ुश्क आँखों से उठी मौज तो दुनिया डूबी

वहीद अख़्तर

जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी

वहीद अख़्तर

हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे

वहीद अख़्तर

हर एक लम्हा किया क़र्ज़ ज़िंदगी का अदा

वहीद अख़्तर

इक दश्त-ए-बे-अमाँ का सफ़र है चले-चलो

वहीद अख़्तर

दश्त की उड़ती हुई रेत पे लिख देते हैं लोग

वहीद अख़्तर

बुत बनाने पूजने फिर तोड़ने के वास्ते

वहीद अख़्तर

बिछड़े हुए ख़्वाब आ के पकड़ लेते हैं दामन

वहीद अख़्तर

बे-बरसे गुज़र जाते हैं उमडे हुए बादल

वहीद अख़्तर

बाम ओ दर ओ दीवार को ही घर नहीं कहते

वहीद अख़्तर

अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे

वहीद अख़्तर

अब्र आँखों से उठे हैं तिरा दामन मिल जाए

वहीद अख़्तर

वो रंग का हुजूम सा वो ख़ुशबुओं की भीड़ सी

वहाब दानिश

खुल गया राज़ छुपी चाह का सब महफ़िल पर

वहाब दानिश

जंगलों में घूमते फिरते हैं शहरों के फ़क़ीह

वहाब दानिश

जब सफ़र की धूप में मुरझा के हम दो पल रुके

वहाब दानिश

इन पर्बतों के बीच थी मस्तूर इक गुफा

वहाब दानिश

वो एक हाथ बढ़ाएगा तुझ को पा लेगा

विपुल कुमार

उसे तो दौलत-ए-दुनिया भी कम भी पाने को

विपुल कुमार

उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो

विपुल कुमार

तमाम इश्क़ की मोहलत है इस आँखों में

विपुल कुमार

सफीर-ए-इश्क़ हमें अब तो हम सफ़र कर लो

विपुल कुमार

मुझ से कब उस को मोहब्बत थी मगर मेरे बा'द

विपुल कुमार

मैं तो शब-ए-फ़िराक़ था तुम एक उम्र थी

विपुल कुमार

कुछ इस लिए भी तिरी आरज़ू नहीं है मुझे

विपुल कुमार