Couplets Poetry (page 45)
यहाँ हर आने वाला बन के इबरत का निशाँ आया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
वो काम मेरा नहीं जिस का नेक हो अंजाम
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
'वहशत' उस बुत ने तग़ाफ़ुल जब किया अपना शिआर
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
'वहशत' सुख़न ओ लुत्फ़-ए-सुख़न और ही शय है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
उठा लेने से तो दिल के रहा मैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
उस दिल-नशीं अदा का मतलब कभी न समझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तुम्हारा मुद्दआ ही जब समझ में कुछ नहीं आया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तू हम से है बद-गुमाँ सद अफ़्सोस
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तू है और ऐश है और अंजुमन-आराई है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
था क़फ़स का ख़याल दामन-गीर
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तेरा मरना इश्क़ का आग़ाज़ था
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
सीने में मिरे दाग़-ए-ग़म-ए-इश्क़-ए-नबी है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
सच कहा है कि ब-उम्मीद है दुनिया क़ाइम
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
रुख़-ए-रौशन से यूँ उट्ठी नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
क़द्रदानी की कैफ़ियत मालूम
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
निशान-ए-मंज़िल-ए-जानाँ मिले मिले न मिले
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नहीं मुमकिन लब-ए-आशिक़ से हर्फ़-ए-मुद्दआ निकले
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
न वो पूछते हैं न कहता हूँ मैं
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मिरे तो दिल में वही शौक़ है जो पहले था
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मेरा मक़्सद कि वो ख़ुश हों मिरी ख़ामोशी से
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मेहनत हो मुसीबत हो सितम हो तो मज़ा है
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मज़ा आता अगर गुज़री हुई बातों का अफ़्साना
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
मजाल-ए-तर्क-ए-मोहब्बत न एक बार हुई
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
कुछ समझ कर ही हुआ हूँ मौज-ए-दरिया का हरीफ़
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ख़याल तक न किया अहल-ए-अंजुमन ने ज़रा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ख़ाक में किस दिन मिलाती है मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
कठिन है काम तो हिम्मत से काम ले ऐ दिल
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
जो गिरफ़्तार तुम्हारा है वही है आज़ाद
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
इस ज़माने में ख़मोशी से निकलता नहीं काम
वहशत रज़ा अली कलकत्वी