Couplets Poetry (page 44)

इस तरह रोज़ हम इक ख़त उसे लिख देते हैं

वाली आसी

हम ख़ून की क़िस्तें तो कई दे चुके लेकिन

वाली आसी

हम हार गए तुम जीत गए हम ने खोया तुम ने पाया

वाली आसी

हमें तेरे सिवा इस दुनिया में किसी और से क्या लेना-देना

वाली आसी

हमें अंजाम भी मालूम है लेकिन न जाने क्यूँ

वाली आसी

हमारे शहर में अब हर तरफ़ वहशत बरसती है

वाली आसी

ग़म के रिश्तों को कभी तोड़ न देना 'वाली'

वाली आसी

सिगरटें चाय धुआँ रात गए तक बहसें

वाली आसी

आज तक जो भी हुआ उस को भुला देना है

वाली आसी

उस शख़्स के ग़म का कोई अंदाज़ा लगाए

वकील अख़्तर

किसी सूरत कोई सूरत निकालो

वकील अख़्तर

झुक के जो आप से मिलता होगा

वकील अख़्तर

आँख की पुतलियों को ग़ौर से देख

वाजिद अमीर

यही तशवीश शब-ओ-रोज़ है बंगाले में

वाजिद अली शाह अख़्तर

याद में अपने यार-ए-जानी की

वाजिद अली शाह अख़्तर

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का

वाजिद अली शाह अख़्तर

तुराब-ए-पा-ए-हसीनान-ए-लखनऊ है ये

वाजिद अली शाह अख़्तर

मुझी को वाइज़ा पंद-ओ-नसीहत

वाजिद अली शाह अख़्तर

कमर धोका दहन उक़्दा ग़ज़ाल आँखें परी चेहरा

वाजिद अली शाह अख़्तर

दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं

वाजिद अली शाह अख़्तर

बे-मुरव्वत हो बेवफ़ा हो तुम

वाजिद अली शाह अख़्तर

बराए-सैर मुझ सा रिंद मय-ख़ाने में गर आए

वाजिद अली शाह अख़्तर

'अख़्तर'-ए-ज़ार भी हो मुसहफ़-ए-रुख़ पर शैदा

वाजिद अली शाह अख़्तर

आज कल लखनऊ में ऐ 'अख़्तर'

वाजिद अली शाह अख़्तर

'सानी' फ़क़त तुम्हारा लिखा जिन ख़ुतूत पर

वजीह सानी

ज़िंदगी अपनी किसी तरह बसर करनी है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़माना भी मुझ से ना-मुवाफ़िक़ मैं आप भी दुश्मन-ए-सलामत

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़ालिम की तो आदत है सताता ही रहेगा

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

ज़बरदस्ती ग़ज़ल कहने पे तुम आमादा हो 'वहशत'

वहशत रज़ा अली कलकत्वी