Couplets Poetry (page 42)

वो पल में जल बुझा और ये तमाम रात जला

वली उज़लत

उस को पहुँची ख़बर कि जीता हूँ

वली उज़लत

तिरी ज़ुल्फ़ की शब का बेदार मैं हूँ

वली उज़लत

तिरी वहशत की सरसर से उड़ा जूँ पात आँधी का

वली उज़लत

तल्ख़ लगता है उसे शहर की बस्ती का स्वाद

वली उज़लत

सिया है ज़ख़्म-ए-बुलबुल गुल ने ख़ार और बोईगुलशन से

वली उज़लत

सख़्त पिस्ताँ तिरे चुभे दिल में

वली उज़लत

पीर हो शैख़ हुआ है देखो तिफ़्लों का मुरीद

वली उज़लत

मोहकमे में इश्क़ के है यारो दीवाने का शोर

वली उज़लत

मैं सहरा जा के क़ब्र-ए-हज़रत-ए-मजनूँ को देखा था

वली उज़लत

कुछ ग़ौर का जौहर नहीं ख़ुद-फ़हमी में हैराँ हैं

वली उज़लत

कहा जो मैं ने गया ख़त से हाए तेरा हुस्न

वली उज़लत

जो हम ये तिफ़लों के संग-ए-जफ़ा के मारे हैं

वली उज़लत

जो आशिक़ हो उसे सहरा में चल जाने से क्या निस्बत

वली उज़लत

जिस पर नज़र पड़े उसे ख़ुद से निकालना

वली उज़लत

जावे थी जासूसी-ए-मजनूँ को ता राहत न ले

वली उज़लत

जपे है विर्द सा तुझ से सनम के नाम को शैख़

वली उज़लत

जल्द मर गए तिरी हसरत सेती हम

वली उज़लत

जा कर फ़ना के उस तरफ़ आसूदा मैं हुआ

वली उज़लत

इश्क़ गोरे हुस्न का आशिक़ के दिल को दे जला

वली उज़लत

इस ज़माने में बुज़ुर्गी सिफ़्लगी का नाम है

वली उज़लत

हम उस की ज़ुल्फ़ की ज़ंजीर में हुए हैं असीर

वली उज़लत

हिन्दू ओ मुस्लिमीन हैं हिर्स-ओ-हवा-परसत

वली उज़लत

ग़नीमत बूझ लेवें मेरे दर्द-आलूद नालों को

वली उज़लत

गए सब मर्द रह गए रहज़न अब उल्फ़त से कामिल हूँ

वली उज़लत

बाद-ए-बहार में सब आतिश जुनून की है

वली उज़लत

ऐ सालिक इंतिज़ार-ए-हज में क्या तू हक्का-बक्का है

वली उज़लत

बिगाड़ना सँवारना है वक़्त के मिज़ाज पर

वली शम्सी

याद करना हर घड़ी तुझ यार का

वली मोहम्मद वली

तुझ लब की सिफ़त लाल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

वली मोहम्मद वली