Couplets Poetry (page 41)

जौन से रस्ते वो हो निकले उधर पहरों तलक

वलीउल्लाह मुहिब

जलता है कि ख़ुर्शीद की इक रोटी हो तय्यार

वलीउल्लाह मुहिब

जब नशे में हम ने कुछ मीठे की ख़्वाहिश उस से की

वलीउल्लाह मुहिब

इस्लाम में ये कैसा इंकार कुफ़्र से है

वलीउल्लाह मुहिब

इश्क़ जब दख़्ल करे है दिल-ए-इंसाँ में 'मुहिब'

वलीउल्लाह मुहिब

इस ख़ानुमाँ-ख़राब को भी दे मियाँ बता

वलीउल्लाह मुहिब

इन दो के सिवा कोई फ़लक से न हुआ पार

वलीउल्लाह मुहिब

हम हवा-ए-वस्ल में याँ तक फिरे

वलीउल्लाह मुहिब

हो गधे पर सवार जा काबा

वलीउल्लाह मुहिब

हर घड़ी वहम में गुज़रे हैं नए अख़बारात

वलीउल्लाह मुहिब

हम-दिगर मोमिन को है हर बज़्म में तकफ़ीर-ए-जंग

वलीउल्लाह मुहिब

है मिरे पहलू में और मुझ को नज़र आता नहीं

वलीउल्लाह मुहिब

गिरते हैं दुख से तेरी जुदाई के वर्ना ख़ैर

वलीउल्लाह मुहिब

ग़ौर कर देखो तो ये इक तार का बिस्तार है

वलीउल्लाह मुहिब

फ़स्ल ख़िज़ाँ में बाग़-ए-मज़ाहिब की की जो सैर

वलीउल्लाह मुहिब

दोस्ती छूटे छुड़ाए से किसू के किस तरह

वलीउल्लाह मुहिब

दीवानगी के सिलसिला का होए जो मुरीद

वलीउल्लाह मुहिब

दीं से पैदा कुफ़्र है और नूर शक्ल-ए-नार है

वलीउल्लाह मुहिब

दिलों का फ़र्श है वाँ पाँव रखने की कहाँ जागह

वलीउल्लाह मुहिब

दर्स-ए-इल्म-ए-इश्क़ से वाक़िफ़ नहीं मुतलक़ फ़क़ीह

वलीउल्लाह मुहिब

दरिया-ए-मोहब्बत से 'मुहिब' ले ही के छोड़ी

वलीउल्लाह मुहिब

दैर में का'बे में मयख़ाने में और मस्जिद में

वलीउल्लाह मुहिब

चराग़-ए-का'बा-ओ-दैर एक सा है चश्म-ए-हक़-बीं में

वलीउल्लाह मुहिब

बे-इश्क़ जितनी ख़ल्क़ है इंसाँ की शक्ल में

वलीउल्लाह मुहिब

ब-तस्ख़ीर-बुताँ तस्बीह क्यूँ ज़ाहिद फिराते हैं

वलीउल्लाह मुहिब

ब-मअ'नी कुफ़्र से इस्लाम कब ख़ाली है ऐ ज़ाहिद

वलीउल्लाह मुहिब

अश्क-बारी से ग़म-ओ-दर्द की खेती-बाड़ी

वलीउल्लाह मुहिब

अरे ओ ख़ाना-आबाद इतनी ख़ूँ-रेज़ी ये क़त्ताली

वलीउल्लाह मुहिब

ऐ दिल तुझे करनी है अगर इश्क़ से बैअ'त

वलीउल्लाह मुहिब

ऐ बंदा-परवर इतना लाज़िम है क्या तकल्लुफ़

वलीउल्लाह मुहिब