Couplets Poetry (page 40)
तुम गाओ अपने राग को उस पास वाइ'ज़ो
वलीउल्लाह मुहिब
तिरे कलाम ने कैसा असर किया वाइ'ज़
वलीउल्लाह मुहिब
तमाम ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ज़ेर-ए-आसमाँ की समेट
वलीउल्लाह मुहिब
सुख़न जिन के कि सूरत जूँ गुहर है बहर-ए-मअ'नी में
वलीउल्लाह मुहिब
शोर रखते हैं जहाँ में जिस क़दर सब्ज़ान-ए-हिंद
वलीउल्लाह मुहिब
शैख़ कहते हैं मुझे दैर न जा काबा चल
वलीउल्लाह मुहिब
शैख़ है तुझ को ही इंकार सनम मेरे से
वलीउल्लाह मुहिब
साक़ी हमें क़सम है तिरी चश्म-ए-मस्त की
वलीउल्लाह मुहिब
रक़ीब जम के ये बैठा कि हम उठे नाचार
वलीउल्लाह मुहिब
रहीम ओ राम की सुमरन है शैख़ ओ हिन्दू को
वलीउल्लाह मुहिब
राग अपना गा हमारा ज़िक्र मत कर ऐ रक़ीब
वलीउल्लाह मुहिब
रात आख़िर है यहाँ आया नज़र आसार-ए-सुब्ह
वलीउल्लाह मुहिब
फूलों की सेज दोस्त की ख़ातिर 'मुहिब' बिछाओ
वलीउल्लाह मुहिब
निकालूँ दिल से मैं नाले की किस तरह आवाज़
वलीउल्लाह मुहिब
नक़्काश-ए-अज़ल ने तो सर-ए-काग़ज़-ए-बाद आह
वलीउल्लाह मुहिब
न तय एक रकअत की मंज़िल हुई
वलीउल्लाह मुहिब
न कीजे वो कि मियाँ जिस से दिल कोई हो मलूल
वलीउल्लाह मुहिब
'मुहिब' तुम बुत-परस्ती को न छोड़ो
वलीउल्लाह मुहिब
मैं हूँ और साक़ी हो और हों रास ओ चुप ये वो बहम
वलीउल्लाह मुहिब
मय-कदे में मस्त हैं और शोर उन का हाव-हू
वलीउल्लाह मुहिब
कुछ न देखा किसी मकान में हम
वलीउल्लाह मुहिब
किया है क़त्अ रिश्ता सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार का हम ने
वलीउल्लाह मुहिब
ख़त का ये जवाब आया कि क़ासिद गया जी से
वलीउल्लाह मुहिब
काश हम नाकाम भी काम आएँ तेरे इश्क़ में
वलीउल्लाह मुहिब
काफ़िर हूँ गर मैं नाम भी का'बे का लूँ कभी
वलीउल्लाह मुहिब
का'बे में वही ख़ुद है वही दैर में है आप
वलीउल्लाह मुहिब
काबा ओ दैर में जब वो बुत-ए-काफ़िर न मिला
वलीउल्लाह मुहिब
काबा जाने की हवस शैख़ हमें भी है वले
वलीउल्लाह मुहिब
जो अज़-ख़ुद-रफ़्ता है गुमराह है वो रहनुमा मेरा
वलीउल्लाह मुहिब
जो अपने जीते-जी को कुएँ में डुबोइए
वलीउल्लाह मुहिब