Couplets Poetry (page 54)

ये फ़ितरत का तक़ाज़ा था कि चाहा ख़ूब-रूओं को

तिलोकचंद महरूम

उठाने के क़ाबिल हैं सब नाज़ तेरे

तिलोकचंद महरूम

तलातुम आरज़ू में है न तूफ़ाँ जुस्तुजू में है

तिलोकचंद महरूम

साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का

तिलोकचंद महरूम

न रही बे-ख़ुदी-ए-शौक़ में इतनी भी ख़बर

तिलोकचंद महरूम

न इल्म है न ज़बाँ है तो किस लिए 'महरूम'

तिलोकचंद महरूम

मंदिर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक

तिलोकचंद महरूम

हूँ वो बर्बाद कि क़िस्मत में नशेमन न क़फ़स

तिलोकचंद महरूम

है ये पुर-दर्द दास्ताँ 'महरूम'

तिलोकचंद महरूम

फ़िक्र-ए-मआश ओ इश्क़-ए-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ

तिलोकचंद महरूम

दिल में कहते हैं कि ऐ काश न आए होते

तिलोकचंद महरूम

दिल के तालिब नज़र आते हैं हसीं हर जानिब

तिलोकचंद महरूम

दाम-ए-ग़म-ए-हयात में उलझा गई उमीद

तिलोकचंद महरूम

बुरा हो उल्फ़त-ए-ख़ूबाँ का हम-नशीं हम तो

तिलोकचंद महरूम

ब-ज़ाहिर गर्म है बाज़ार-ए-उल्फ़त

तिलोकचंद महरूम

बाद-ए-तर्क-ए-आरज़ू बैठा हूँ कैसा मुतमइन

तिलोकचंद महरूम

अक़्ल को क्यूँ बताएँ इश्क़ का राज़

तिलोकचंद महरूम

ऐ हम-नफ़स न पूछ जवानी का माजरा

तिलोकचंद महरूम

शौक़ कहता है कि हर जिस्म को सज्दा कीजे

तौसीफ़ तबस्सुम

पाँव में लिपटी हुई है सब के ज़ंजीर-ए-अना

तौसीफ़ तबस्सुम

क्या ये सच है कि ख़िज़ाँ में भी चमन खिलते हैं

तौसीफ़ तबस्सुम

कौन से दुख को पल्ले बाँधें किस ग़म को तहरीर करें

तौसीफ़ तबस्सुम

जो भी नरमी है ख़यालों में न होने से है

तौसीफ़ तबस्सुम

दुख झेलो तो जी कड़ा ही रखना

तौसीफ़ तबस्सुम

दिल की बाज़ी हार के रोए हो तो ये भी सुन रक्खो

तौसीफ़ तबस्सुम

दिल बयाज़-ए-उम्र की औराक़-गर्दानी में है

तौसीफ़ तबस्सुम

देखने वाली अगर आँख को पहचान सकें

तौसीफ़ तबस्सुम

अच्छा है कि सिर्फ़ इश्क़ कीजे

तौसीफ़ तबस्सुम

ज़र का बंदा हो कि महरूमी का मारा हुआ शख़्स

तौक़ीर तक़ी

यहीं आना है भटकती हुई आवाज़ों को

तौक़ीर तक़ी