Couplets Poetry (page 56)
कुछ दिन से अजब बे-कली घेरे है तसव्वुर
तस्लीम अहमद तसव्वुर
ज़ब्त करता हूँ वले इस पर भी है ये जोश-ए-अश्क
मीर तस्कीन देहलवी
'तस्कीं' ने नाम ले के तिरा वक़्त-ए-मर्ग आह
मीर तस्कीन देहलवी
'तस्कीन' करूँ क्या दिल-ए-मुज़्तर का इलाज अब
मीर तस्कीन देहलवी
शब-ए-विसाल में सुनना पड़ा फ़साना-ए-ग़ैर
मीर तस्कीन देहलवी
पूछे जो तुझ से कोई कि 'तस्कीं' से क्यूँ मिला
मीर तस्कीन देहलवी
ख़ूब-सूरत न हो कोई तो न हो बदनामी
मीर तस्कीन देहलवी
करता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ से दिल का मुबादला
मीर तस्कीन देहलवी
जिस वक़्त नज़र पड़ती है उस शोख़ पे 'तस्कीं'
मीर तस्कीन देहलवी
इतनी न कीजे जाने की जल्दी शब-ए-विसाल
मीर तस्कीन देहलवी
अभी इस राह से कोई गया है
मीर तस्कीन देहलवी
लब से सुनाऊँ हाल क्या दिल का मिरे हबीब
तासीर सिद्दीक़ी
अच्छे हैं फ़ासले के ये तारे सजाते हैं
तासीर सिद्दीक़ी
ज़ेहन पर बोझ रहा, दिल भी परेशान हुआ
तारिक़ क़मर
ये किस की प्यास के छींटे पड़े हैं पानी पर
तारिक़ क़मर
वो लोग भी तो किनारों पे आ के डूब गए
तारिक़ क़मर
वो भी रस्मन यही पूछेगा कि कैसे हो तुम
तारिक़ क़मर
साथ होने के यक़ीं में भी मिरे साथ हो तुम
तारिक़ क़मर
फिर आज भूक हमारा शिकार कर लेगी
तारिक़ क़मर
मिज़ाज अपना मिला ही नहीं ज़माने से
तारिक़ क़मर
मेरे ज़ख़्मों का सबब पूछेगी दुनिया तुम से
तारिक़ क़मर
मैं चाहता हूँ कभी यूँ भी हो कि मेरी तरह
तारिक़ क़मर
क्या अजब लोग थे गुज़रे हैं बड़ी शान के साथ
तारिक़ क़मर
कोई शिकवा न शिकायत न वज़ाहत कोई
तारिक़ क़मर
किसी जवाज़ का होना ही क्या ज़रूरी है
तारिक़ क़मर
कैसे रिश्तों को समेटें ये बिखरते हुए लोग
तारिक़ क़मर
जैसे मुमकिन हो इन अश्कों को बचाओ 'तारिक़'
तारिक़ क़मर
इस सलीक़े से मुझे क़त्ल किया है उस ने
तारिक़ क़मर
इस लहजे से बात नहीं बन पाएगी
तारिक़ क़मर
हर आदमी वहाँ मसरूफ़ क़हक़हों में था
तारिक़ क़मर