Heart Broken Poetry (page 170)
न समझा उम्र गुज़री उस बुत-ए-काफ़र को समझाते
दाग़ देहलवी
मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
दाग़ देहलवी
मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर
दाग़ देहलवी
मिरी आह का तुम असर देख लेना
दाग़ देहलवी
मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
दाग़ देहलवी
मर्ग-ए-दुश्मन का ज़ियादा तुम से है मुझ को मलाल
दाग़ देहलवी
लीजिए सुनिए अब अफ़्साना-ए-फ़ुर्क़त मुझ से
दाग़ देहलवी
कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
दाग़ देहलवी
कहीं है ईद की शादी कहीं मातम है मक़्तल में
दाग़ देहलवी
जिस जगह बैठे मिरा चर्चा किया
दाग़ देहलवी
जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
दाग़ देहलवी
इस लिए वस्ल से इंकार है हम जान गए
दाग़ देहलवी
ईद है क़त्ल मिरा अहल-ए-तमाशा के लिए
दाग़ देहलवी
हो सके क्या अपनी वहशत का इलाज
दाग़ देहलवी
ग़म्ज़ा भी हो सफ़्फ़ाक निगाहें भी हों ख़ूँ-रेज़
दाग़ देहलवी
फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं
दाग़ देहलवी
दुनिया में जानता हूँ कि जन्नत मुझे मिली
दाग़ देहलवी
दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात
दाग़ देहलवी
चाक हो पर्दा-ए-वहशत मुझे मंज़ूर नहीं
दाग़ देहलवी
बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है
दाग़ देहलवी
बात का ज़ख़्म है तलवार के ज़ख़्मों से सिवा
दाग़ देहलवी
अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे
दाग़ देहलवी
अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा
दाग़ देहलवी
आती है बात बात मुझे बार बार याद
दाग़ देहलवी
ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है
दाग़ देहलवी
उज़्र उन की ज़बान से निकला
दाग़ देहलवी
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं
दाग़ देहलवी
उस के दर तक किसे रसाई है
दाग़ देहलवी
उस से क्या ख़ाक हम-नशीं बनती
दाग़ देहलवी
उन के इक जाँ-निसार हम भी हैं
दाग़ देहलवी