Heart Broken Poetry (page 273)

शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के

अनवर महमूद खालिद

ख़ुदा भी मेरी तरह बा-कमाल ऐसा था

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

ये दिल ही जानता है फिर कहाँ कहाँ भटके

अनुभव गुप्ता

उसे यादों में जब लाना मुसलसल कर दिया मैं ने

अनुभव गुप्ता

सितम सहने की तय्यारी भी कोई चीज़ होती है

अनुभव गुप्ता

फ़ज़ा-ए-दिल में घनी तीरगी सी लगती है

अनुभव गुप्ता

दिल यही सोच के बेताब हुआ जाता है

अनुभव गुप्ता

जुर्म ठहरा हाल से आगे का नक़्शा देखना

अनसर अली अनसर

जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी

अंजुम तराज़ी

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

अंजुम तराज़ी

हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे

अंजुम तराज़ी

क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी

अंजुम सिद्दीक़ी

ग़म सहें या ख़ुशी को प्यार करें

अंजुम सिद्दीक़ी

दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा

अंजुम सिद्दीक़ी

बा-वफ़ा हूँ मिरी ख़ता है ये

अंजुम सिद्दीक़ी

वो इक दिन जाने किस को याद कर के

अंजुम सलीमी

उठाए फिरता रहा मैं बहुत मोहब्बत को

अंजुम सलीमी

उदासी खींच लाई है यहाँ तक

अंजुम सलीमी

तू मिरे सब्र का अंदाज़ा लगा सकता है

अंजुम सलीमी

ठीक से याद भी नहीं अब तो

अंजुम सलीमी

पत्थर में कौन जोंक लगाएगा मेरे दोस्त

अंजुम सलीमी

मुझे पता है कि बर्बाद हो चुका हूँ मैं

अंजुम सलीमी

ख़्वाब शर्मिंदा-ए-विसाल हुआ

अंजुम सलीमी

कहने सुनने के लिए और बचा ही क्या है

अंजुम सलीमी

इतना बे-ताब न हो मुझ से बिछड़ने के लिए

अंजुम सलीमी

इश्क़ फ़रमा लिया तो सोचता हूँ

अंजुम सलीमी

हिज्र में भी हम एक दूसरे के

अंजुम सलीमी

हिज्र को बीच में नहीं छोड़ा

अंजुम सलीमी