Hope Poetry (page 164)
इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला
अलीम मसरूर
चले बज़्म-ए-दौराँ से जब ज़हर पी के
अलीम मसरूर
ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी
अलीम अख़्तर
शरीक-ए-हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार आज भी है
अलीम अख़्तर
निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है
अलीम अख़्तर
मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या
अलीम अख़्तर
मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना
अलीम अख़्तर
किसी के वादा-ए-फ़र्दा पर ए'तिबार तो है
अलीम अख़्तर
दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें
अलीम अख़्तर
दर्द बढ़ कर दवा न हो जाए
अलीम अख़्तर
करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे
अलीम अफ़सर
चले थे भर के रेत जब सफ़र की जिस्म-ओ-जाँ में हम
अलीम अफ़सर
बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग
अलीम अफ़सर
बन कर लहू यक़ीन न आए तो देख लें
अलीम अफ़सर
ये कहना हार न मानी कभी अंधेरों से
आलमताब तिश्ना
विसाल-ए-यार की ख़्वाहिश में अक्सर
आलमताब तिश्ना
मैं जब भी घर से निकलता हूँ रात को तन्हा
आलमताब तिश्ना
उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा
आलमताब तिश्ना
सिवाए-दर-ब-दरी उस को ख़ाक मिलता है
आलमताब तिश्ना
शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा हूँ
आलमताब तिश्ना
सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना
आलमताब तिश्ना
मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे
आलमताब तिश्ना
हिसार-ए-मक़्तल-ए-जाँ में लहू लहू मैं था
आलमताब तिश्ना
गिनती में बे-शुमार थे कम कर दिए गए
आलमताब तिश्ना
दर्द की इक लहर बल खाती है यूँ दिल के क़रीब
आलमताब तिश्ना
असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना
आलमताब तिश्ना
आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला
आलमताब तिश्ना
उर्दू
आलम मुज़फ्फ़र नगरी
याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द
आलम ख़ुर्शीद
तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो
आलम ख़ुर्शीद