Sad Poetry (page 243)

अब तिरे हिज्र में यूँ उम्र बसर होती है

अनवापुल हसन अनवार

आया न आब-ए-रफ़्ता कभी जूएबार में

अनवापुल हसन अनवार

वो मक़्तल में अगर खींचे हुए तलवार बैठे हैं

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

सारे कुश्तों से जुदा ढंग इज़्तिराब-ए-दिल का है

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

मज़ा देता है याद आ कर तिरा बिस्मिल बना देना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

कहाँ मुमकिन है पोशीदा ग़म-ए-दिल का असर होना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

आना भी आने वाले का अफ़्साना हो गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

क्या शहर में है गर्मी-ए-बाज़ार के सिवा

अनवर सिद्दीक़ी

हुजूम शोला में था हल्क़ा-ए-शरर में था

अनवर सिद्दीक़ी

डुबोए देता है ख़ुद-आगही का बार मुझे

अनवर सिद्दीक़ी

अज़ाब-ए-हमसफ़री से गुरेज़ था मुझ को

अनवर सिद्दीक़ी

सच है उम्र भर किस का कौन साथ देता है

अनवर शऊर

किस क़दर बद-नामियाँ हैं मेरे साथ

अनवर शऊर

कभी रोता था उस को याद कर के

अनवर शऊर

हो गए दिन जिन्हें भुलाए हुए

अनवर शऊर

गो मुझे एहसास-ए-तन्हाई रहा शिद्दत के साथ

अनवर शऊर

गो कठिन है तय करना उम्र का सफ़र तन्हा

अनवर शऊर

फ़रिश्तों से भी अच्छा मैं बुरा होने से पहले था

अनवर शऊर

आदमी के लिए रोना है बड़ी बात 'शुऊर'

अनवर शऊर

ज़हर की चुटकी ही मिल जाए बराए दर्द-ए-दिल

अनवर शऊर

ये तन्हाई ये उज़्लत ऐ दिल ऐ दिल

अनवर शऊर

ये मत पूछो कि कैसा आदमी हूँ

अनवर शऊर

यादों के बाग़ से वो हरा-पन नहीं गया

अनवर शऊर

याद करो जब रात हुई थी

अनवर शऊर

उस बज़्म में क्या कोई सुने राय हमारी

अनवर शऊर

उन से तन्हाई में बात होती रही

अनवर शऊर

टूटा तिलिस्म-ए-वक़्त तो क्या देखता हूँ मैं

अनवर शऊर

सुलैमान-ए-सुख़न तो ख़ैर क्या हूँ

अनवर शऊर

'शुऊर' वक़्त पे दिल की दवा हुई होती

अनवर शऊर

शक नहीं है हमें उस बुत के ख़ुदा होने में

अनवर शऊर