Couplets Poetry (page 12)

इल्म में झींगुर से बढ़ कर कामराँ कोई नहीं

ज़रीफ़ लखनवी

ये तरक़्क़ी का ज़माना है तिरे आशिक़ पर

ज़रीफ़ जबलपूरी

किस ज़ालिम ने पर पेड़ों के काट दिए

ज़मीर अज़हर

दिल का मौसम ज़र्द हो तो कुछ भला लगता नहीं

ज़मीर अज़हर

उम्र भर जिस ने किसी का हुक्म माना ही नहीं

ज़मीर अतरौलवी

कोई भूका जो फ़र्त-ए-ज़ोफ़ से कुछ लड़खड़ा जाए

ज़मीर अतरौलवी

ख़ून के जो रिश्ते थे बन गए अज़ाब-ए-जाँ

ज़मीर अतरौलवी

इज़्न सूरज की किरन को नहीं जाने का जहाँ

ज़मीर अतरौलवी

हज़ारों ज़ुल्म हों मज़लूम पर तो चुप रहे दुनिया

ज़मीर अतरौलवी

ग़रीबी नाम है जिस का अज़ाब-ए-जान होती है

ज़मीर अतरौलवी

मैं रतजगों के मुकम्मल अज़ाब देखूँगा

ज़मान कंजाही

मैं एक उम्र से उन को तलाश करता हूँ

ज़मान कंजाही

किसी भी शाख़ पर पत्ता नहीं है

ज़मान कंजाही

मैं ने माँगी थी उजाले की फ़क़त एक किरन

ज़किया ग़ज़ल

'ज़की' हमारा मुक़द्दर हैं धूप के ख़ेमे

ज़की तारिक़

सिमटे हुए जज़्बों को बिखरने नहीं देता

ज़की तारिक़

रोज़ सुनता हूँ मैं हँसने की सदा

ज़की तारिक़

मेरे अंदर निहाँ है अक्स मिरा

ज़की तारिक़

इताब-ओ-क़हर का हर इक निशान बोलेगा

ज़की तारिक़

हम भी कहने लगे हैं रात को रात

ज़की तारिक़

गुमान होता है मुझ को तुम्हारे आने का

ज़की तारिक़

दरीदा-जैब गरेबाँ भी चाक चाहता है

ज़की तारिक़

अजनबी ख़ुशबू की आहट से महक उट्ठा बदन

ज़की तारिक़

ये रात यूँही बसर हो गई तो क्या होगा

ज़की काकोरवी

याद इतना है कि मैं होश गँवा बैठा था

ज़की काकोरवी

याद आए हैं उफ़ गुनह क्या क्या

ज़की काकोरवी

वो तिरी ज़ुल्फ़ का साया हो कि आग़ोश तिरा

ज़की काकोरवी

वाए नाकामी-ए-क़िस्मत कि भँवर से बच कर

ज़की काकोरवी

उलझी थीं जिन नसीम से कलियाँ ख़बर न थी

ज़की काकोरवी

तू ही बता दे कैसे काटूँ

ज़की काकोरवी